चल अकेला

हज़ारों मील लंबे रास्ते तुझको बुलाते,

यहाँ दुखड़े सहने के वास्ते तुझको बुलाते

है कौन सा वो इंसान यहाँ पर जिसने दुख ना झेला।

चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला ।

मुकेश जी के गाये इस गीत ने जीवन में बहुत बार हिम्मत दी है। वैसे कुछ मामलों में इंसान को बड़ी जल्दी सबक मिलता है।

यह मेरा तीसरा ब्लॉग है। जब शुरू किया तब उत्साह का स्तर कुछ और ही था। बहुत जल्दी ये समझ में आया कि बाबा तुलसीदास जी ने ऐसे ही स्वांतः सुखाय की बात नहीं की थी। सचमुच हमारे सुख या संतोष को दूसरों की मुखर स्वीकृति पर निर्भर नहीं होना चाहिए। बहरहाल सबक तो ज़िंदगी में मिलते ही रहते हैं और मिलने भी चाहिएं।

सोचा था कि जीवन के प्रारंभ से अनुभव यात्रा को साझा करूंगा, फिलहाल बीच के एक पड़ाव की बात कर रहा हूँ।  मैंने 30 सितंबर,1980 की रात में दिल्ली छोड़ी क्योंकि 1अक्तूबर,1980 को मुझे आकाशवाणी, जयपुर में कार्यग्रहण करना था, हिंदी अनुवादक के रूप में।

इत्तफाक से 2 अक्तूबर,1980 को ही वहाँ, राम निवास बाग में, प्रगतिशील लेखक सम्मेलन था, शायद प्रेमचंद की स्मृतियों को समर्पित था यह सम्मेलंन्। यह आयोजन काफी चर्चित हुआ था क्योंकि महादेवी जी इस आयोजन की मुख्य अतिथि थीं और अपने संबोधन में उनका कहना था कि हम जंगली जानवरों के लिए अभयारण्य बना रहे हैं, परंतु मनुष्यों के लिए भय का परिवेश बन रहा है।

महादेवी जी के वक्तव्य पर वहाँ मौज़ूद राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री- जगन्नाथ पहाड़िया नाराज़ हो गए, वो बोले कि ‘महादेवी जी की कवितायें तो कभी भी मेरी समझ में नही आईं, मैं यहाँ साहित्यकारों के लिए कुछ अनुदान की घोषणा करने आया था, अब नहीं करूंगा। सत्ता के नशे में चूर पहाड़िया ये समझ ही नहीं पाए कि महादेवी होने का मतलब क्या है! बाद में काफी दिनों तक इस पर बहस चली और बाद में जगन्नाथ पहाड़िया को माफी मांगनी पड़ी थी।

खैर मुझे यह आयोजन किसी और कारण से भी याद है। इस तरह की संस्थाओं पर, विशेष रूप से जिनके साथ ‘प्रगतिशील’ शब्द जुड़ा हो, उन पर सभी जगह कम्युनिस्टों का कब्ज़ा रहा है। उनके लिए किसी का कवि या कहानीकार होना उतना आवश्यक नहीं है, जितना कम्युनिस्ट होना। वैसे मुझे सामान्यतः इस पर कोई खास आपत्ति नही रही है। वहाँ जाने से पहले मैं काफी समय से कवितायें, गीत आदि लिख रहा था और विनम्रतापूर्वक बताना चाहूंगा कि अनेक श्रेष्ठ साहित्यकारों से मुझे प्रशंसा भी प्राप्त हो चुकी थी।

जयपुर जाते ही क्योंकि इस आयोजन में जाने का अवसर मिल गया तो मुझे लगा कि यह अच्छा अवसर है कि यहाँ कविता पाठ करके, स्थानीय साहित्यकारों के साथ परिचय प्राप्त कर लिया जाए। रात में जब कवि गोष्ठी हुई तो मैंने भी अपनी एक ऐसी रचना का पाठ कर दिया, जिसके लिए मैं दिल्ली में भरपूर प्रशंसा प्राप्त कर चुका था। यह घटना भुलाना काफी समय तक मेरे लिए बहुत कठिन रहा। कोई रचना पाठ करता है तब रचना बहुत अच्छी न हो तब भी प्रोत्साहन के लिए ताली बजा देते हैं। लेकिन वहाँ मुझे लगा कि किसी ने मेरी कविता जैसे सुनी ही नहीं थी। ऐसा सन्नाटा मैंने वहाँ देखा। शायद उन महान आयोजकों को इस बात का अफसोस था कि एक अनजान व्यक्ति ने कविता-पाठ कर कैसे दिया।  

खैर वहाँ एक-दो रचनाकारों को सुन, जिनसे बाद में घनिष्ठ परिचय बना, उनमें से एक हैं कृष्ण कल्पित, जो अभी शायद आकाशवाणी महानिदेशालय में कार्यरत हैं। उनके एक प्रसिद्ध गीत की कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं-

राजा-रानी प्रजा मंतरी, बेटा इकलौता

मां से कथा सुनी थी, जिसका अंत नहीं होता।

बिना कहे महलों में कैसे आई पुरवाई,

राजा ने दस-बीस जनों को फांसी लगवाई।

राम-राम रटता रहता था, राजा का तोता।

मां से कथा सुनी थी जिसका अंत नहीं होता॥

आकाशवाणी, जयपुर में 3 साल रहा, बहुत अच्छे कलाकारों और कवियों से वहाँ मुलाकात हुई। एक थे लाज़वाब तबला वादक ज़नाब दायम अली क़ादरी, बहुत घनिष्ठ संबंध हो गए थे हमारे। मेरे बच्चे का जन्मदिन आया तो वो स्वयं घर पर आए और घंटों तक गज़लें प्रस्तुत कीं। आकाशवाणी में वे तबला वादक थे, परंतु वे गायन के कार्यक्रम प्रस्तुत करते थे।ए  वो बोलते भी थे कि सरकार को हाथ बेचे हैं , गला नहीं। इसके बाद जब तक हम वहाँ रहे, ऐसे अवसरों पर वे आकर कर्यक्रम करते रहे। एक बार हमारे मकान मालिक के बच्चे का जन्मदिन था, उनसे कहा तो बोले, शर्माजी आप तो हमारे घर के आदमी हैं, अगर हम हर किसी के यहाँ ऐसे ही गायेंगे,तो क्या ये ठीक होगा?

वहाँ रहते हुए आकाशवाणी की कई कवि गोष्ठियों में भाग लिया। स्वाधीनता दिवस के अवसर पर रिकॉर्ड की जा रही एक कवि गोष्ठी याद आ रही है, उसमें केंद्र निदेशक श्री गिरीश चंद्र चतुर्वेदी भी स्टूडियो में बैठे थे। राजस्थान के एक प्रसिद्ध गीतकार का नंबर आया तो वे बोले, यह गीत मैंने अपने जन्मदिन पर लिखा था, प्रस्तुत कर रहा हूँ-

काले कपड़े पहने हुए सुबह देखी,

देखी हमने अपनी सालगिरह देखी।

इस पर केंद्र निदेशक तुरंत उछल पड़े, नहीं ये गीत नहीं चलेगा, कोई और पढ़िए। वास्तव में वह गीत स्वतंत्रता दिवस से ही जोड़कर देखा जाता।

एक और गीत की पंक्तियां आज ताक याद हैं-

फ्यूज़ बल्बों के अद्भुद समारोह में

रोशनी को शहर से निकाला गया।

आकाशवाणी में मेरी भूमिका हिंदी अनुवादक की थी, इस प्रकार मैं प्रशासन विंग में था, लेकिन मेरी मित्रता वहाँ प्रोग्राम विंग के क्रिएटिव लोगों के साथ अधिक थी। एक पूरा आलेख आकाशवाणी के कार्यकाल पर लिखा जा सकता है, लेकिन फिलहाल इतना ही।

अंत में जयपुर के एक और अनन्य शायर मित्र को याद करूंगा- श्री मिलाप चंद राही। बहुत अच्छे इंसान और बहुत प्यारे शायर थे। जयपुर में रहते हुए ही एक दिन यह खबर आई कि दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। उनकी इन पंक्तियों के साथ उनको याद कर रहा हूँ-

रवां-दवां थी, सियासत में रंग भरते हुए,

लरज़ गई है ज़ुबां, दिल की बात करते हुए।

ये वाकया है तेरे शहर से गुज़रते हुए,

हरे हुए हैं कई ज़ख्म दिल के भरते हुए।

मुझे पता है किसे इंतज़ार कहते हैं,

कि मैंने देखा है लम्हात को ठहरते हुए।

खुदा करे कि तू बाम-ए-उरूज़ पर जाकर

किसी को देख सके सीढ़ियां उतरते हुए॥

नजर-नवाज़ वो अठखेलियां कहाँ राही,

चले है बाद-ए-सबा अब तो गुल कतरते हुए।

 

 

आज के लिए इतना ही, फिर बात शुरू करेंगे, दिल्ली के दिनों से।

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