दिल्ली में रहते हुए मैंने पीताम्बर बुक डिपो और दिल्ली प्रेस में दो प्राइवेट नौकरी की थीं और उसके बाद 6 वर्ष  तक उद्योग मंत्रालय में कार्य किया, जिसमें से मैं 3 वर्ष तक संसदीय राजभाषा समिति में डेपुटेशन पर भी रहा।

खैर फिलहाल तो दिल्ली प्रेस की ही बात चल रही है। कुछ साहित्यिक गतिविधियां समानांतर चलती रहीं, जैसे दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी, जो कि पुरानी दिल्ली स्टेशन के सामने है वहाँ शनिवारी सभा होती थी ‘लिटरेचर स्टडी ग्रुप’, जिसमें साहित्यिक अभिरुचि वाले लोग एकत्रित होते थे और नए रचनाकार अपनी रचनाओं का पाठ करते थे। साहित्य सृजन में प्रोत्साहन की दृष्टि से यह शनिवारी सभा बहुत महत्वपूर्ण थी। बहुत से साहित्यकार किसी ज़माने में इसमें शामिल होते रहे हैं। अब पता नहीं यह सभा होती है या नहीं।

सोमवार को सोशल स्टडी ग्रुप की बैठक होती थी, जिसमें से बहुत से नेता उभरकर आए हैं। मैं सोमवार की सभा में कभी-कभी और शनिवारी सभा में अधिकतर जाता था।

इसके अलावा, नियमित रेल यात्रा में, जैसे भजन मंडली वाले अपने साथी खोज लेते हैं, ताश खेलने वाले भी अपनी मंडली बना लेते हैं, ऐसे ही कुछ कवि लोग थे, जो शाम को नई दिल्ली से शाहदरा लौटते थे। मैंने खुद को उनके नियमित श्रोताओं में शामिल कर लिया था।

वो अपनी कविताएं भी लिखते थे, जो ठीक-ठाक थीं, लेकिन कुछ बड़े कवि- शायरों की कविताएं भी पढ़ते थे, मगन होकर गाते थे। इनमें से एक-दो मुझे आज तक याद हैं-

ज़रूर एक नींद मेरे साथ ए मेहमान-ए-गम ले ले,

सफर दरवेश है, ऐ ज़िंदगी थोड़ा तो दम ले ले।

मैं अपनी ज़िंदगानी बेचता हूँ, उनके बदले में,

खुदा चाहे खुदा ले ले, सनम चाहे सनम ले ले।

ज़माने में सभी को मुझसे दावा-ए-मुहब्बत है,

कोई ऐसा नहीं मिलता जो मुझसे मेरे गम ले ले।

ये मेरी ज़िंदगी की आखिरी तहरीर है क़ैफी,

फिर इसके बाद शायद मौत, हाथों से कलम ले ले।

अब आखिरी शेर से ये मालूम होता है कि ये क़ैफी साहब की रचना है।

एक और रचना जिसका पाठ वो सज्जन करते थे, वह है-

बुझी हुई शमा का धुआं हूँ और अपने मरक़ज़ पे जा रहा हूँ,

इस दिल की दुनिया तो मिट चुकी है

अब अपनी हस्ती मिटा रहा हूँ।

उधर वो घर से निकल चुके हैं

इधर मेरा दम निकल रहा है,

अज़ब तमाशा है ज़िंदगी का

वो आ रहे हैं, मैं जा रहा हूँ।   

इसके रचनाकर कौन हैं, मुझे मालूम नहीं है।

एक सज्जन थे राधेश्याम शर्मा जी, जो लायब्रेरी की शनिवारी सभा में आते थे और कभी-कभी ट्रेन में भी टकरा जाते थे, उनको ऑडिएंस की काफी तलाश रहती थी और ट्रेन में तो वह मिल ही जाती है। सो ट्रेन में टकराते ही वो बोलते थे, शर्माजी आप कविता सुनाइए। मैं उनसे कहता, ठीक है आप कविता सुनाना चाहते हैं, सुना दीजिए। और वे शुरु हो जाते। उनकी एक प्रिय कविता थी-

तुम्ही ने ज़िंदगी मुझको,

कि अपनी ज़िंदगी कहकर

नशीली आंख का देकर नशा-

मदहोश कर डाला,

मगर कुछ होश बाकी है,

मेरा भी फैसला सुन लो,

सच्चाई है कि मेरी ज़िंदगी की

ज़िंदगी तुम हो।

वो झूम झूमकर इसे गाते थे और काफी तालियां बजवा लेते थे।

दिल्ली प्रेस में काफी बड़े हॉल में हम लोग बैठते थे, एक सेल्समैन वहाँ थे, उन्होंने मेरा नाम रख दिया था- मास्टरजी!, वहाँ सब लोग मुझे इस नाम से ही बुलाते थे। पूछने पर उन्होंने बताया कि मेरी आवाज़ पूरे हॉल में उस तरह पहुंचती है, जैसे क्लासरूम में शिक्षक की आवाज़ पहुंचती है।

खैर दिल्ली प्रेस में सेवा के दौरान ही एशिया 72 प्रदर्शनी लगी थी, मैं उसे देखने गया लेकिन लेट हो गया और तब मैंने बगल में स्थित पुराना किला देखा, जिसके बाहर डीडीए ने फुलवारी बनाकर सजावट की हुई थी। उसको देखने के बाद ही ये गीत लिखा था-

खंडहर गीत

तुम उजाडों से न ऊब जाओ कहीं

मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।

ये तिमिर से घिरी राजसी सीढ़ियां,

इनसे चढ़ती उतरती रही पीढ़ियां,

युग बदलते रहे,तंत्र गलते गए,

टूटती ही रहीं वंशगत रूढ़ियां।

था कभी जो महल, बन वही अब गया,

बेघरों के लिए है, बसेरा प्रिये।

मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए। 

 

कल कहानी बना आज मेरे लिए

उस कहानी के संकेत मिलते यहाँ,

भूल जाते हैं जब अपना इतिहास हम

ठोकरें फिर पुरानी हैं पाते वहाँ,

अपने जीवन की उपलब्धियों की ध्वजा

मैं फिराता रहा हर डगर इसलिए।

मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।

 

आज की सप्तरंगी छटाएं सभी

एक दिन खंडहर ही कही जाएंगी,

देखकर नवसृजन की विपुल चंद्रिका

अपनी बदसूरती पर ये शरमाएंगी,

स्नेह की नित्य संजीवनी यदि न हो,

ज़िंदगी भी तो एक खंडहर है प्रिये,

मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।

आज की कथा यहीं विराम लेती है।

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