13. मंज़िल न दे, चराग न दे, हौसला तो दे

एक नाइंसाफी तो लंबे समय से चलती चली आई है कि इतिहास को राजाओं के शासन काल से बांट दिया गया, बल्कि इतिहास का मतलब सिर्फ इतना हो गया कि किस राजा ने किस समय तक शासन किया, कहाँ जीत-हार हासिल की, कौन से अच्छे-बुरे काम किए।

मैंने भी यहाँ अपनी नौकरियों की अवधि के हिसाब से, काल विभाजन का प्रयास शुरू में किया, लेकिन यह सिर्फ समय के हिसाब से घटनाओं को याद करने के लिए है, बेशक कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं तो सीधे तौर पर नौकरी से भी जुड़ी हैं। लेकिन यह तो ऐसी घटनाओं का इतिहास है, जो बड़े पैमाने पर भीतर घटित होती हैं। दिल्ली में रहते हुए तो अधिकांश महत्वपूर्ण घटनाएं, दफ्तर के दायरे से बाहर ही घटित हुई हैं।

दिल्ली में मेरे लिए दफ्तर के अलावा, तीन महत्वपूर्ण घटना-स्थल रहे दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी, आकाशवाणी और काव्य गोष्ठियां/ कवि सम्मेलन। एक विशेष उपलब्धि मेरे जीवन में यह रही कि जिन विशिष्ट कवियों को मैंने लाल किले से कविता-पाठ करते हुए सुना, दिल से उनकी सराहना की, बाद में उनमें से अनेक को हिंदुस्तान कॉपर तथा एनटीपीसी में कार्यरत रहते हुए अपने आयोजनों में आमंत्रित करने तथा उनसे अंतरंग बातचीत करने का अवसर भी प्राप्त हुआ।

खैर अब ऐसा करता हूँ कि नौकरी बदल लेता हूँ। दिल्ली प्रेस में मैंने 3 वर्ष तक नौकरी की, इस बीच मैंने स्टाफ सेलेक्शन की प्रतियोगी परीक्षा में भाग लिया, केंद्रीय नौकरियों में अवर श्रेणी क्लर्क के पद हेतु और इसमें मुझे सफलता भी प्राप्त हो गई। अब मैं अकबर इलाहाबादी साहब की इस सीख का पालन कर सकता था-

खा डबल रोटी, किलर्की कर, खुशी से फूल जा

और वास्तव में ऐसा हुआ कि मैं जो कि एक दुबला-पतला इंसान था, धीरे-धीरे फूलता चला गया।

खैर उद्योग भवन के एलिवेटिड ग्राउंड फ्लोर में, स्थापना-3 अनुभाग में मैं स्थापित हो गया। हमारे कमरे के ऊपर ही पहले मंत्री श्री टी.ए.पाई का कमरा था,जो बेसमेंट से ही लिफ्ट द्वारा अपने फ्लोर पर चले जाते थे। बाद में सरकार बदलने पर श्री जॉर्ज फर्नांडीज़ आए, जो अक्सर लुंगी पहने हुए, सीढ़ियों से ऊपर जाते हुए दिख जाते थे।

अब कुछ दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी की शनिवारी सभा की बात कर लेते हैं। वहाँ जाना प्रारंभ करते समय मेरी उम्र करीब 25 साल थी। एक युवा शायर वहाँ आते थे जो शायद 18-19 वर्ष के थे, कुंवर महिंदर सिंह बेदी सहर के शिष्य थे, नाम था- राना सहरी। उनकी शायरी चमत्कृत करने वाली थी, हम सब लोग उनकी जमकर तारीफ करते थे। बाद में उनसे कभी मुलाक़ात नहीं हो पाई। जगजीत सिंह ने भी उनकी कुछ गज़लें गाई हैं। जैसे-

मंज़िल न दे चराग न दे, हौसला तो दे

तिनके का ही सही, तू मगर आसरा तो दे।

मैंने ये कब कहा कि मेरे हक़ में हो ज़ुरूर,

लेकिन खमोश क्यों है तू,

कोई फैसला तो दे।

उनकी एक और प्रसिद्ध गज़ल के कुछ शेर इस तरह हैं –

कोई दोस्त है न रक़ीब है,

तेरा शहर कितना अज़ीब है।

मैं किसे कहूँ मेरे साथ चल,

यहाँ सबके सर पे सलीब है।

वो जो इश्क था वो ज़ुनून था,

ये जो हिज़्र है ये नसीब है।

दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी की शनिवारी सभा के ही एक कवि थे- शैलेंद्र श्रीवास्तव, रेलवे में नौकरी करते थे। उनकी शादी हुई गाज़ियाबाद में, बारात में हमारे साथ चलने वालों में श्री विष्णु प्रभाकर भी शामिल थे। हमारे लिए उनकी उपस्थिति किसी मंत्री से ज्यादा महत्वपूर्ण थी।

दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी के अनुभव तो बहुत अधिक हैं, आगे भी इस बारे में बात होती रहेगी, अंत में एक कवि श्री गोविंद नीराजन के गीत की कुछ पंक्तियां यहाँ प्रस्तुत करना चाहूंगा –

अंधियारे सपनों के संग जिए।

 

मन को रास नहीं आई छाया,

अंगारों से रैन छुवाई है,

हम खुद से सौ योजन दूर हुए,

अपनों बारंबार बधाई है।

शहनाई को तरूण हृदय के

क्रंदन बांट दिए,

बंदनवार शिशिर घर बांध दिए।

अंधियारे सपनों के संग जिए।।

 

परी कथा की राजकुमारी सा

कैदी सीमाओं का मेरा मन,

गीत-अगीत सभी पर पहरे हैं,

तट लहरों का सीधा आमंत्रण,

धुंधलाए जलयान

मुंदी पलकों में ढांप लिए

नाम हथेली पर लिख मिटा दिए।

अंधियारे सपनों के संग जिए।।

बातें तो बहुत हैं, टाइम भी बहुत है, फिर बात करेंगे। अभी के लिए नमस्कार्।

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