26. इन्हें प्रणाम करो ये बड़े महान हैं!

विंध्याचल परियोजना में शुरू के 3-4 साल बड़े सुकून और आनंद के साथ बीते, सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियां, स्कूलों की प्रगति के लिए पुस्तकों और सामग्रियों का प्रबंध, खेलकूद, कवि सम्मेलन आदि। सांस्कृतिक गतिविधियों के संचालन में भी मेरी ऐसी भूमिका बन गई कि एकाध बार ऐसा कोई आयोजन हुआ और मैं बाहर रहा तो बाद में लोगों ने शिकायत की।

विंध्यनगर का स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स खुले आकाश के नीचे होने वाली गतिविधियों के लिए और रूसी प्रेक्षागृह, हॉल में होने वाले कार्यक्रमों के लिए निरंतर प्रयोग में आते रहते थे।

कार्मिक एवं प्रशासन विभाग (बाद में इसका नाम बदलकर मानव संसाधन विभाग किया गया) के प्रधान के रूप में श्री आर.एन.रामजी के बाद श्रीमान स्वतंत्र कुमार आए। श्री कुमार में एक विशेषता तो यह थी कि वे सबका पूरा नाम याद रखते थे और पूरे नाम से ही बुलाते थे। काम काफी तेज़ी से करते थे, इसलिए उनको राजधानी एक्सप्रेस भी कहा जाता था। लेकिन एक और नकारात्मक किस्म की विशेषता उनकी यह थी कि वे गालियों का प्रयोग बड़ी उदारता से करते थे।

एकाध बार यूनियन के नेताओं अथवा सीआईएसएफ के अधिकारियों के साथ बातचीत में, उनकी ज़ुबान से उदारतापूर्वक निकली गालियों के कारण औद्योगिक वातावरण बिगड़ने की नौबत आ गई थी।

यह भी बता दूं कि हमारे महाप्रबंधक श्री एस.एस.दुआ जहाँ बहुत अच्छे इंसान थे, वहीं उनके साथ एक सबसे बड़ी कमज़ोरी थी उनकी पत्नी श्रीमती दुआ, जो परंपरा के अनुसार लेडीज़ क्लब की अध्यक्ष थीं और वह हर व्यक्ति और विभाग के कार्यकलापों पर टिप्पणी करना अपना अधिकार समझती थीं।

श्रीमती दुआ के कारण, महाप्रबंधक महोदय के बहुत से विभागाध्यक्षों से संबंध खराब रहते थे, जिनमें मानव संसाधन विभाग लगभग हमेशा शामिल रहा।

इत्तफाक से मेरी श्रीमती जी पहले लेडीज़ क्लब द्वारा चलाए जाने वाले टायनी टॉट्स स्कूल में प्रिंसिपल बनी और फिर लेडीज़ क्लब की पदाधिकारी भी बनीं। इस कारण विपक्षी पार्टियों द्वारा मुझे महाप्रबंधक का आदमी या शुद्ध भाषा में कहा जाए तो चमचा मान लिया गया।

एक यह भी हुआ कि मुझे मेरी पहली पदोन्नति सही समय पर मिल गई, जबकि एनटीपीसी के पूरे कार्यकाल में यही एकमात्र पदोन्नति है जो मुझे समय पर मिली।

हिंदी अधिकारी को यहाँ कार्मिक विभाग में कितनी भी ज़िम्मेदारी दी जा सकती है, सांस्कृतिक गतिविधियों में उसका निष्पादन भले ही सबके द्वारा सराहा जाए, लेकिन यह निश्चित रूप से माना जाता है कि पदोन्नति पर उसकी दावेदारी सबसे अंत में आती है।

यह भी स्पष्ट है कि मेरे विभाग की तरफ से पदोन्नति हेतु जो प्राथमिकता दर्शायी गई थी उसमें मेरा नाम बाद में रखा गया था, लेकिन महाप्रबंधक महोदय ने उस प्राथमिकता को न मानते हुए मुझे पदोन्नति की मंज़ूरी दी तथा शुद्ध रूप से मानव संसाधन के मेरे एक साथी को पदोन्नति नहीं मिल पाई, परियोजनाओं हिंदी अधिकारी को मानव संसाधन का अशुद्ध सदस्य माना जाता है, उसकी ज़िम्मेदारियां हो सकती हैं,अधिकार नहीं।

इसके बाद से स्वतंत्र कुमार जी और उनके बाद आने वाले एक-दो सज्जन, जैसे नंद बाबा आदि, अघोषित अथवा घोषित रूप से मेरे शत्रु हो गए। इसमें जाहिर है कि लेडीज़ क्लब का भी योगदान था, क्योंकि एकाध विभागाध्यक्ष, जिन्हें मैं संत मानता था, उनके बारे में बहुत बाद में मालूम हुआ कि वे मुझसे शत्रुता पाले हुए थे।

स्वतंत्र कुमार जी जब हमारे विभागाध्यक्ष थे, तभी की एक घटना है, हमारी परियोजना का एक विज्ञापन छपा था जिसमें अंग्रेजी आशुलिपिक की भर्ती के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे। इस पर केंद्रीय सचिवालय हिंदी परिषद की ओर से एक पत्र आया कि ये गलत है, भर्ती केवल हिंदी अथवा द्विभाषी आशुलिपिकों के लिए की जानी चाहिए।

इस पर स्वतंत्र कुमार जी ने कहा- हम जवाब ही नहीं देंगे, साले हमारा क्या कर लेंगे!

यही स्वतंत्र कुमार जी बाद में पूरी कंपनी में राजभाषा कार्यान्वयन की ज़िम्मेदारी निभा रहे थे और सबको इस संबंध में उपदेश देते घूमते थे।

श्री मुकुट बिहारी ‘सरोज’ जी की दो पंक्तियां याद आ रही हैं-

प्रभुता के घर जन्मे समारोह ने पाले हैं
इनके ग्रह मुँह में चाँदी के चम्मच वाले हैं
उद्घाटन में दिन काटे, रातें अख़बारों में,
ये शुमार होकर ही मानेंगे अवतारों में

ये तो बड़ी कृपा है जो ये दिखते भर इन्सान हैं।
इन्हें प्रणाम करो ये बड़े महान हैं।

 अपनी एक और छोटी सी कविता इस बहाने पेल देता हूँ-

बहेलिए

धागे तो कच्चे हैं, मनमोहक नारों के,

लेकिन जब जाल बुने जाते हैं यारों के,

और ये शिकारी, डालते हैं दाना,

हर रोज़ नए वादों का,

भाग्य बदल देने के

जादुई इरादों का,

फंसती है भोले कबूतर सी जनता तब,

जाल समेट, राजनैतिक बहेलिए

बांधते हैं, जन-गण की उड़ाने स्वच्छंद

और बनते हैं भाग्यविधाता-

अभिशप्त ज़माने के।

(श्रीकृष्ण शर्मा)

फिर मिलेंगे, नमस्कार।

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