विंध्याचल परियोजना में मेरा प्रवास 12 वर्ष का रहा, जो सेवा के दौरान किसी एक स्थान पर सबसे अधिक है, और एनटीपीसी में 22 वर्ष की कुल सेवा भी किसी एक संस्थान में सबसे लंबी सेवा थी। इससे यह भी सिद्ध हो गया कि मुझ जैसा चंचल चित्त व्यक्ति भी कहीं दीर्घ सेवा सम्मान पा सकता है।

एनटीपीसी ऐसे फील्ड में कार्यरत है, जहाँ घाटा होने की संभावना बहुत कम है, उत्पादन के आधार पर मिलने वाले प्रोत्साहन आकर्षक हैं, अन्यथा देखा जाए तो यहाँ का प्रबंधन किसी भी दृष्टि से कर्मचारी कल्याण का विज़न लिए हुए नहीं है, हालांकि नारे तो यहाँ काफी आकर्षक लगाए जाते हैं। सेवानिवृत्त कर्मचारियों को जो पेंशन मिलती है, यदि उसको ही देख लें तो मालूम हो जाएगा कि यहाँ का प्रबंधन कितना महान है।

खैर मैं फिलहाल विंध्याचल परियोजना में अपने कार्यकाल के अनुभव बता रहा था। यहाँ ये डर भी लगता है कि मैं जो हमेशा यह मानता रहा कि मैं अजातशत्रु हूँ, वहीं मैं यह विवरण देता रहूं कि कौन-कौन थे जिन्होंने मुझे अपना शत्रु माना हुआ था। यह भी डर रहता है कि कहीं मैं अपने गुणगान में ही न उलझ जाऊं। मेरे लिए यही सबसे महत्वपूर्ण है कि मेरे पाठक की रुचि बनी रहे और उसे यह लगे कि कुछ पढ़ने लायक पढ़ा है।

खैर स्वतंत्र कुमार जी के बाद श्री एस. नंद ने मानव संसाधन विभाग के प्रधान के रूप में कार्यभार ग्रहण किया। उन्होंने बाद में सकारात्मक सोच पर एक पुस्तक भी लिखी। मुझे यही लगता है कि यदि इन सज्जन की सोच सकारात्मक थी तो फिर नकारात्मक सोच क्या होती है!

मैं वहाँ स्कूल समन्वय का काम भी देखता था सो यह बता दूं कि वहाँ टाउनशिप में तीन स्कूल चलते थे, जिनके संचालन के लिए विभिन्न संस्थाओं के साथ अनुबंध किया गया था। ये स्कूल थे दिल्ली पब्लिक स्कूल, डी पॉल स्कूल और सरस्वती शिशु मंदिर। इनमें से पहले दो स्कूल अंग्रेजी माध्यम के थे और तीसरा हिंदी माध्यम स्कूल था। सरस्वती शिशु मंदिर में फीस भी अपेक्षाकृत कम थी तथा सामान्य कर्मचारियों के बच्चे इस स्कूल में अधिक संख्या में पढ़ते थे।

प्रबंधन द्वारा सोसायटियों के साथ किए गए अनुबंध के अंतर्गत इन स्कूलों को बहुत सी सुविधाएं और सामग्री प्रदान की जाती थीं। मेरा हमेशा यह प्रयास रहा कि सुविधाओं के मामले में किसी स्कूल को कमी न महसूस हो। इसी सिलसिले में एक घटना का उल्लेख कर रहा हूँ।

स्कूलों से हम उनकी सामग्री संबंधी आवश्यकताओं की सूची, विवरण मांगते थे तथा कम सामग्री होने पर तो वे स्वयं खरीदकर दावा प्रस्तुत कर देते थे अधिक सामग्री के मामले में हम खरीद का प्रबंध करते थे। ऐसे ही एक मामले में, सरस्वती शिशु मंदिर की तीनों प्रयोगशालाओं के लिए सामग्री और उपकरणों की खरीद की जानी थी।

खरीद के लिए मानव संसाधन, सामग्री और वित्त विभाग के प्रतिनिधियों की एक समिति बनाई गई और सरस्वती शिशु मंदिर के भौतिकी, रसायन और जीव विज्ञान के अध्यापकों को भी साथ ले लिया गया, जिससे वे सामग्री की गुणवत्ता के आधार पर उसका चयन कर सकें।

विंध्याचल परियोजना से जबलपुर पास पड़ने वाला ऐसा शहर था, जहाँ ये सभी सामग्रियां उपलब्ध हो सकती थीं। कमेटी के सदस्यों ने, क्रय-प्रक्रिया के अनुसार, वहाँ के स्थानीय बाज़ार में घूमकर सामग्रियों का विवरण एवं दरें एकत्रित कीं, उनका तुलनात्मक विवरण तैयार किया, अब संबंधित दुकानों पर चलकर उन सामग्रियों की गुणवत्ता देखनी थी, जो दर के आधार पर खरीदने योग्य पाई गई थीं। यह कार्य उस स्कूल के अध्यापकों को करना था, जहाँ चारित्रिक विकास को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है। लेकिन ये महान अध्यापक इस बीच वहाँ के बाज़ार में किसी पार्टी से मिल लिए थे, जिसने उनको समुचित लालच दे दिया था।

जब उन महान शिक्षकों से कहा गया कि चलकर सामग्री और उसकी गुणवत्ता की जांच कर लीजिए, तो वे बोले कि नहीं जी, हमको तो अमुक दुकान से खरीदना है। अब एक गलती हमसे ये हो गई थी कि हम उनको भी अपने  बराबर की संख्या में ले गए थे। जब वे किसी तरह अपनी भूमिका निभाने को तैयार नहीं हुए, तब मैंने अपने ऑफिस में स्थिति बताई और कहा कि हम खरीद किए बिना वापस आ रहे हैं और हमने बाद में क्रय आदेश भेजकर खरीद की।

इस प्रकार हमको सबक मिला और बाद में हम खरीद के लिए कंपनी के रसायन विभाग का एक प्रतिनिधि ले जाते थे। यह भी समझ में आ गया कि जहाँ पर स्कूलों का प्रबंध इन महान लोगों के हाथ में है, वहाँ इतनी दुर्दशा क्यों है।

अब मैं अपने विभाग की तो बात भूल ही गया, नंद बाबा को उचित सम्मान बाद में देंगे, आज का किस्सा तो अलग ही हो गया।

एक कविता की कुछ पंक्तियां, शायद सूंड फैज़ाबादी की है, यहाँ दे रहा हूँ-

निर्माण कार्य चालू है,

पुल बांध रहे बंदर और भालू हैं,

शायद राम पार उतर जाएं

क्योंकि एक बोरी सीमेंट में

आठ बोरी बालू है।

 नमस्कार।

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