चलिए आगे बढ़ने से पहले नंद बाबा का थोड़ा सम्मान कर लेते हैं। नंद बाबा, मां-बाप ने इनका नाम रखा था –सच्चिदानंद, इन्होंने बाद में अपनाया एस. नंद और जनता ने प्यार से इनको कहा- नंद बाबा।

कारण जो भी रहे हों, विंध्याचल परियोजना में कार्यग्रहण करते ही इनकी महाप्रबंधक महोदय से बिगड़ गई। वैसे एक बहुत बड़ा गुनाह जो इनकी निगाह में, इनके आने से पहले हो चुका था, वह था मेरी पदोन्नति होना, क्योंकि उसमें मेरे शुद्ध एच.आर. के एक साथी की पदोन्नति नहीं हो पाई थी। मुझे किसी का बुरा होने पर खुशी हो, ऐसा मैं कोशिश करता हूँ कि कभी न हो, लेकिन यह एक प्रशासनिक निर्णय था, जैसा हुआ मानना चाहिए। मेरी गाड़ी बाद में लगातार रुकती रही, उस पर तो नंद बाबा को कभी अफसोस नहीं हुआ होगा।

वैसे नंद बाबा की सोच में जातिगत फैक्टर भी था, ऐसा मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ। अब नंद बाबा की शत्रुता थी महाप्रबंधक से, और वो यह लड़ाई लड़ना चाहते थे मेरे माध्यम से!

परियोजना में और इसके आसपास बहुत से अच्छे कवि और कलाकार थे। परियोजना स्तर पर जो आयोजन होते थे, उनके मुख्य अतिथि तो महाप्रबंधक होते थे। नंद बाबा हर माह स्थानीय कलाकारों का एक आयोजन कराते, जिसके मुख्य अतिथि वे खुद होते थे। महाप्रबंधक को इसके बारे में बताया भी नहीं जाता था। इसके लिए प्रस्ताव मुझे बनाना होता था और डीजीएम के रूप अपनी आर्थिक शक्तियों के अंतर्गत नंद बाबा इस पर होने वाले खर्च का अनुमोदन करते थे।

इस आयोजन में नंद बाबा अपने प्रिय शिष्यों को सुनते थे। ज्यादातर गाना-बजाना होता था, कविता कभी-कभी होती थी। अब अगर किसी ने कह दिया कि शर्मा जी बहुत अच्छा गाते हैं, तो बाबाजी कहते, वो बाद में गाएंगे, सबके जाने के बाद। कोई इंसान भीतर से इतना छोटा हो और वह सकारात्मक सोच का दावा करे, भगवान ही मालिक है।

इन आयोजनों का प्रस्ताव क्योंकि मुझे बनाना होता था इसलिए अगर महाप्रबंधक का कोप किसी को झेलना पड़ता तो वो मैं ही होता। लेकिन शुक्र है, हमारे महाप्रबंधक इतने छोटे दिल के नहीं थे। उन्हें लॉयंस क्लब के तथा अन्य आयोजनों में भरपूर महत्व मिल जाता था। सो उनको इन आयोजनों से कोई फर्क नहीं पड़ता था।

अब फिलहाल राजनीति की बात काफी हो गई। सांस्कृतिक आयोजनों और कवि सम्मेलनों से तो परियोजना के जीवन में नया उत्साह आता था, मुझे याद है इस सिलसिले में मैंने काफी यात्राएं भी कीं। अलीगढ़ में नीरज जी के घर जाकर उनसे मुलाक़ात, मुम्बई में शरद जोशी जी से मिलना, हालांकि वे हमारे यहाँ आ नहीं पाए थे। नितिन मुकेश जी के बारे में तो अलग से एक ब्लॉग लिखने का प्रयास करूंगा। उदयपुर भी जाने का अवसर मिला था, वहाँ से पंडवानी नृत्य और कठपुतली के कार्यक्रम कराने के लिए। उस ज़माने में दरअसल मोबाइल का इतना प्रचलन नहीं हुआ था।

फिलहाल मैं उस क्षेत्र के एक धुनी व्यक्ति का ज़िक्र करना चाहूंगा। ये सज्जन सिंगरौली और विंध्याचल परियोजनाओं में फोटोग्राफी का काम करते थे, शक्तिनगर में फोटो स्टूडियो भी था इनके बड़े भाई का- नन्हे स्टूडियो। इन्हें हम दाढ़ी वाले पांडे जी के नाम से जानते थे। शायद सत्यनारायण पांडे नाम था, अगर मुझे सही याद है तो। एक बार पांडे जी तब सुर्खियों में आए थे, जब राजीव गांधी शक्तिनगर आए थे। जो नहीं जानते हैं उन्हें बता दूं कि वहाँ अगल-बगल दो परियोजनाएं, यानि बिजलीघर हैं और एक की टाउनशिप का नाम शक्तिनगर है। किसी भी परियोजना में आने के लिए वीआईपी शक्तिनगर के हैलीपैड पर आते हैं।

हुआ ऐसे कि राजीव गांधी के आगमन के समय पांडे जी किसी सुरक्षा-पास वाली गाड़ी में बैठकर हैलीपैड पर पहुंच गए। बाद में बनारस के समाचारपत्रों में छपा- ‘एक अदने से फोटोग्राफर ने प्रधानमंत्री की सुरक्षा में सेंध लगाई’।

खैर मैं पांडे जी का ज़िक्र किसी और संदर्भ में कर रहा था। पांडे जी का जन्मदिन शरद पूर्णिमा को पड़ता है। मुझ जैसे लोगों की रुचि जबकि कविता और सुगम/ फिल्मी संगीत में थी, वहीं पांडे जी शास्त्रीय संगीत में गहरी रुचि लेते थे और उन्होंने शास्त्रीय संगीत के अनेक श्रेष्ठ कार्यक्रम आयोजित किए, जिनमें- पं. जसराज का गायन,  बिस्मिल्लाह खां साहब की शहनाई, पं. शिव कुमार शर्मा, हरि प्रसाद चौरसिया आदि अनेक लोगों के कार्यक्रम आयोजित किए, इन कार्यक्रमों के संचालन का अवसर भी मुझे प्राप्त होता था।

जहाँ तक कंपनी की ओर से किए जाने वाले आयोजनों का प्रश्न है, उनमें जगजीत सिंह, अभिजीत, महेंद्र कपूर आदि अनेक कलाकार आए। नितिन मुकेश जी का आयोजन तो यादगार है, उसके बारे में अलग से बात करूंगा।

यहाँ मैं गणतंत्र दिवस और स्वाधीनता दिवस के कार्यक्रमों में मेरी भागीदारी के बारे में एक वाकया बताना चाहूंगा। शायद स्वाधीनता दिवस के एक आयोजन के समय की बात है, भोपाल में मेरी बड़ी बहन रहती थीं, जिनकी इस आयोजन से पहले मृत्यु हो गई। उस समय हमारे विभागीय प्रधान थे श्री नागकुमार और महाप्रबंधकथे श्री जी.एस.सरकार। मैंने अपनी बहन के अंतिम संस्कार में जाने के लिए छुट्टी मांगी, इस पर श्री नागकुमार ने कहा-  ‘मि. शर्मा ऑय एम सॉरी बट मैं आपको छुट्टी नहीं दे सकता।’ ऐसा भी होता है, रिश्तेदारी में मुझे कुछ बहाना बनाना पड़ा।

किस्से तो बहुत हैं, आगे और बात करेंगे, फिलहाल सुकवि श्री सोम ठाकुर जी की एक श्रेष्ठ रचना का कुछ भाग  शेयर करना चाहूंगा-

क्या बतलाएं हमने कैसे शाम-सवेरे देखे हैं,

सूरज के आसन पर बैठे,घोर अंधेरे देखे हैं।

कोई दीवाना जब होठों तक अमृत घट ले आया,

काल-बली बोला मैंने, तुझसे बहुतेरे देखे हैं।

मन कस्तूरी हिरण हो गया, रेत पड़ी मछली निंदिया

जब से होरी ने धनिया के नयन बड़ेरे देखे हैं।

                                                                    (सोम ठाकुर)

नमस्कार।

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