हाँ तो कहाँ जाना है- गोआ!

जो एक पर्यटक के रूप में वहाँ गए हैं, उनके मन में एक छवि होगी गोआ की, लेकिन वहाँ रहने वाले के लिए तो गोआ कुल मिलाकर, वही नहीं होता, जो किसी पर्यटक के लिए होता है!

हालांकि जब मैं एक वर्ष तक मुंबई रहा, उस दौरान मेरे लिए समुद्र किनारे का आकर्षण वैसा ही बना रहा था, जैसा किसी पर्यटक के लिए होता है। बाद में जब फिर से 3 महीने मुंबई रहा, तब घुमक्कड़ी की वह प्रवृत्ति काफी कम हो गई थी।

आज की तारीख में मेरी अपनी उम्र और अवस्था को देखते हुए, पता नहीं क्यों गोआ के नाम पर मुझे बॉबी के प्रेम नाथ याद आते हैं, मछुआरों के सरदार।

खे खेखे खेखे ओ रे साहिबा, प्यार में सौदा नहीं

या फिर- तेरा लड़का कहीं मुंसीपॉलिटी के गटर में पड़ा होगा!

दूर से किसी शहर के बारे में पढ़कर, लोगों से सुनकर जो धारणा हम बनाते हैं, वह कितनी सच उतरती है, जब हम वहाँ पहुंचते हैं, घूमने के लिए नहीं, रहने के लिए!

मुंबई में, जैसा मैंने पहले बताया, दो बार रहा मैं, पहली बार तो कंपनी का क्वार्टर था, पवई में प्राइम लोकेशन पर, टॉप 14 वां फ्लोर, कहीं कोई दिक्कत नहीं, बस यही है कि रहने का मन था, लेकिन राजनीति का शिकार होकर लौट आया,एक वर्ष से कम समय में!

दूसरी बार मेरे रिटायर होने के बाद, जब बेटे ने जॉइन किया था एक प्रायवेट कंपनी में, तब अंधेरी पश्चिम में एक सोसायटी में रहे थे, कुल मिलाकर 3 महीने तक। इस बार कारण यह था कि बेटे को काम पसंद नहीं आया और हमने 3 महीने बाद ही वापस लौटने का फैसला किया।

तो इस बार हम एक सोसायटी में रहे थे, ग्राउंड फ्लोर पर। सोसायटी जिसके कर्णधारों को शायद अपने मराठी मानुस होने का काफी घमंड था और उसमें हमारी मकान मालकिन थी, एक पढ़ी-लिखी क्रिश्चियन महिला। इस महिला के पढ़ी-लिखी होने के उल्लेख, का विशेष उद्देश्य शायद यह भी है, कि सोसायटी के कर्णधारों के लिए उनकी असभ्यता ही उनकी पहचान थी, लेकिन ये महिला उनसे जमकर टक्कर ले रही थी।

इस प्रकार कई बार स्थानीय मूल्यों का परिचय काफी असभ्य तरीके से भी होता है, उसी के बीच पता चलता है कि मूल्य क्या हैं और लोगों की अपने बारे में गलतफहमी क्या हैं। हम तो खैर वहाँ कम समय ही रहे, लेकिन इस बीच भी हमारी मकान-मालकिन सोसायटी के सैक्रेटरी को थाने से घुड़की दिलवा चुकी थी।

यह भी बड़े अफसोस की बात है कि मुंबई में, जगह-जगह लहराते शिव सेना के झंडे, सामान्यतः यही संदेश देते हैं, कि यहाँ सदा असभ्यता का, दादागिरी का ही पर्चम लहराता रहेगा। मेरे विचार में पढ़े लिखे और बड़ी सोच वाले स्थानीय लोगों को इसे दूर करना चाहिए, कुछ हद तक हुआ भी है शायद, लेकिन ठाकरे परिवार के कागज़ी शेर अब कुछ ज्यादा उत्तेजित हैं, ऐसा लगता है।

ये इधर-उधर की बातें करने के बाद, आज अहमद फराज़ साहब की एक लंबी गज़ल के कुछ शेर प्रस्तुत कर रहा हूँ, इसके कुछ शेर गुलाम अली साहब ने भी गाए हैं और मैं भी शौक से गुनगुनाता रहा हूँ-

 

अब के तज्दीद-ए-वफ़ा का नहीं इम्काँ जानाँ
याद क्या तुझको दिलाएँ तेरा पैमाँ जानाँ।


यूँ ही मौसम की अदा देख के याद आया है
किस क़दर जल्द बदल जाते हैं इन्साँ जानाँ।

ज़िन्दगी तेरी अता थी सो तेरे नाम की है
हम ने जैसे भी बसर की तेरा एहसाँ जानाँ।

दिल ये कहता है कि शायद हो फ़सुर्दा तू भी
दिल की क्या बात करें दिल तो है नादाँ जानाँ।

अव्वल-अव्वल की मुहब्बत के नशे याद तो कर
बे-पिये भी तेरा चेहरा था गुलिस्ताँ जानाँ।

मुद्दतों से ये ही आलम न तवक़्क़ो न उम्मीद
दिल पुकारे ही चला जाता है जानाँ जानाँ।


हर कोई अपनी ही आवाज़ से काँप उठता है
हर कोई अपने ही साये से हिरासाँ जानाँ।

अब तेरा ज़िक्र भी शायद ही ग़ज़ल में आये
और से और हुआ दर्द का उन्वाँ जानाँ।

हम कि रूठी हुई रुत को भी मना लेते थे
हम ने देखा ही न था मौसम-ए-हिज्राँ जानाँ।

                                          -ज़नाब अहमद फराज़

 

फिर मिलेंगे, नमस्कार।

***************