कहते हैं कि मौसम पर बात करना सबसे आसान होता है लेकिन जब मौसम अपनी पर आ जाए तब उसको झेलना सबसे मुश्किल होता है।

मैंने भी अपने कुछ गीतों में और  एक गज़ल में मौसम का ज़िक्र किया था, गज़ल के कुछ शेर यहाँ दे रहा हूँ-

आज मौसम पे तब्सिरा कर लें,

और कुछ ज़ख्म को हरा कर लें। 

जिनके नुस्खों पे रोग पलते हैं, 

उन हक़ीमों से मशविरा कर लें। 

आह के शेर, दर्द की नज़्में, 

इक मुसलसल मुशायरा कर लें। 

अब ये बात तो राजनैतिक मौसम की थी, हालांकि मुझे इस पर आपत्ति है कि ‘राजनैतिक’  में ‘नैतिक’ क्यों आता है।

खैर मेरा मन इस समय चल रहे बरसात के मौसम पर बात करने का है, जो देश भर में बहुत से प्राण ले चुका है। वैसे तो  ये सच्चाई है कि भारत में हर मौसम कुछ जानें लेकर ही जाता है।

यह भी सही है कि  कुदरत की मार जब पड़ती है, तब बड़े से बड़े सूरमा राष्ट्र भी कमज़ोर साबित हो जाते हैं, लेकिन शायद  भारत जैसे देशों में ये मार कुछ ज्यादा घातक होती है।

मैं तो अब गोआ में हूँ, वैसे भी यहाँ के ऊंचे इलाके में हूँ, बहुत बारिश पड़ रही है, यहाँ समुद्र है और ऊंचे-नीचे इलाके हैं। मैंने अभी तक यहाँ, अपने इलाके में, सड़कों पर पानी जमा होते नहीं देखा है। वैसे मैंने पूरा इलाका नहीं देखा है, जितना देखा, उसके आधार पर कह रहा हूँ।

मुझे लगता है, कुदरती तौर पर शहरों में जो ऊंचे-नीचे इलाके होते हैं, बल्कि शहरों की जगह  मैं कहूंगा कि जहाँ शहर बसाए जाते हैं, उन इलाकों में जो चढ़ाइयां और ढलान होते हैं, पानी इकट्ठा होने का जो प्राकृतिक रूट होता है, यदि उसमें अधिक छेड़छाड़ न की जाए, शहरों के किनारे जल संग्रहण के लिए कुछ बड़े-बड़े तालाब- झील आदि बना दिए जाएं, तब कुदरत की यह मार शायद काफी हद तक कम की जा सकती है। इस लिहाज़ से टाउन प्लैनर्स की विशेष भूमिका हो सकती है।

मुझे ऐसा लगता है कि बाढ़ की, सूखे की जो समस्याएं आती हैं, उनका स्थान आधारित अध्ययन किया जाना चाहिए, ऐसा कोई विभाग यदि है, तो उसमें गंभीर और प्रतिभाशाली लोगों को इस भविष्यमूलक योजना की तैयारी में लगाया जाए, जिससे इन आपदाओं का प्रभाव जहाँ ये कम है वहाँ समाप्त हो और जहाँ अधिक हैं वहाँ कम से कम हो सके और जहाँ तक हो सके, इन आपदाओं के कारण किसी के प्राण न जाएं।

डॉ. राही मासूम रज़ा की कुछ पंक्तियां, इस गंभीर माहौल में शेयर करने का मन हो रहा है, जो शायद उनके उपन्यास ‘दिल एक सादा कागज़’ में थीं-

कौन आया दिल-ए-नाशाद, नहीं कोई नहीं

राहरौ होगा, कहीं और चला जाएगा, 

गुल करो शमा, बुझा दो, म-औ-मीना-औ-अयाग,

अपनी आंखों के किवाड़ों को मुकफ्फल कर लो, 

अब यहाँ कोई नहीं, कोई नहीं आएगा। 

आज मौसम की मार पर यह चर्चा यहीं समाप्त करता हूँ।

नमस्कार।

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