आज असहिष्णुता के बारे में बात करने की इच्छा है।

ये असहिष्णुता, उस असहिष्णुता की अवधारणा से कुछ अलग है, जिसको लेकर राजनैतिक दल चुनाव से पहले झण्डा उठाते रहे हैं, और अवार्ड वापसी जैसे उपक्रम होते रहे हैं।

मुझे इसमें कतई कोई संदेह नहीं है कि समय के साथ-साथ सहिष्णुता लगातार कम होती गई है और इसका किसी एक राजनैतिक दल से सीधा संबंध नहीं है, हाँ एक प्रकार की असहिष्णुता दिखाने वाले किसी एक राजनैतिक दल के निकट हो सकतेे हैैं  और दूसरी तरह की असहिष्णुता दिखाने वाले किसी दूसरे दल के निकट हो सकते हैैं।

जैसे मेरे मन में अक्सर ये खयाल आता है कि उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद यदि आज जिंदा होते, जिन्होंने उनके उपन्यासों और  कहानियों को पढ़ा है, वे विचार करके देख लें, मेरा मानना है कि यदि वे आज लिखे गए होते तो शायद प्रेमचंद जी न जाने कितने मुकदमों का सामना कर रहे होते और फिर उनका समय लेखन में नहीं, अदालतों के चक्कर काटने में बीतता। इनमें से ज्यादातर मुकदमे बहन मायावती जी की विचारधारा वाले लोगों की तरफ से हो सकते थे, कुछ अपने को उच्च वर्गीय और कुलीन मानने वालों की तरफ से भी हो सकते थे।

वैसे असहिष्णुता का यह वातावरण बनाने में कुछ ख्याति पाने की चाहत रखने वालों की भी काफी बड़ी भूमिका है। मुझे लगता है कि कुछ वकील जिनका धंधा ठीक से नहीं चलता, या वे किसी भी कीमत पर प्रसिद्धि पाना चाहते हैं, वे इस इंतज़ार में रहते हैं कि किसी नई फिल्म में कुछ तो ऐसा मिल जाए जिसको लेकर विवाद खड़ा किया जा सके। कोई नाम हो- व्यक्ति का या स्थान का या कुछ भी उनके शैतानी दिमाग में ऐसा कारण बन सकता हो, जिसको लेकर मुकदमा ठोका जा सके, वे इसके लिए हमेशा तैयार रहते हैं। इसीलिए तो खयाल आता है कि बेचारे प्रेमचंद जी अथवा अन्य पुराने लेखक इन हालात का सामना कैसे करते।

अभी ‘सामना’ शब्द आ गया पिछली पंक्ति में, तो मुझे खयाल आया कि ‘सामना’ वाले, शिव सैनिक तो मौके के अनुसार कभी भारतीय संस्कृति और कभी क्षेत्रीयता की नफरत भरी भावना के अलंबरदार बन जाते हैं। मुझे अचंभा होता है कि  एक ही व्यक्ति अथवा संस्था द्वारा सर्वसमावेशी भारतीय संस्कृति और संकीर्ण क्षेत्रीयता की भावना, दोनों का प्रतिनिधित्व कैसे किया जा सकता है। हमारे ये महान सड़क छाप सैनिक, फिल्मों के बारे में भी अपनी राय रखते हैं, कि कौन सी फिल्म चलने दी जानी है और कौन सी नहीं। आश्चर्य इस बात का है कि स्वयं को प्रगतिशील मानने वाली पार्टियां ऐसी पार्टी को क्यों बर्दाश्त करती हैं और न्यायालय द्वारा इनको समुचित दंड क्यों नहीं दिया जाता जिससे पुनः ऐसी संस्थागत गुंडागर्दी न की जा सके।

पिछले दिनों एक निर्माणाधीन ऐतिहासिक फिल्म की शूटिंग के दौरान जब राजस्थान में गुंडागर्दी की गई, ‘करणी सेना’ नाम दिया गया था इस गुंडों की सेना को, इसका मुखिया टी.वी. पर इंटरव्यू देते भी देखा गया, ऐसा लग रहा था अभी ब्यूटी पार्लर होकर आया है, शुद्ध ढोंगी दिख रहा था, और उसकी मनोकामना भी पूरी हो रही थी क्योंकि टीवी पर लोग उसका इंटरव्यू ले रहे थे। गुंडागर्दी करने के पीछे उसकी जो मनोकामना थी, वह पूरी हो रही थी।

असहिष्णुता का साम्राज्य बहुत लंबा है, निःसंदेह इसमें आरएसएस से जुड़े कुछ संगठन, बजरंग दल, गौ रक्षा दल और न जाने किस-किस नाम से हैं, इनके द्वारा भी आजकल जमकर गुंडागर्दी की जा रही है। मोदी जी समय-समय पर इनके विरुद्ध बोलते हैं, लेकिन इतना काफी नहीं है। इनके विरुद्ध ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए कि दोबारा ये सिर न उठा सकें।

मुझे सचमुच बार-बार ये खयाल आता है कि आज अगर महात्मा गांधी होते तो वे क्या कर पाते और अगर प्रेमचंद होते तो वे क्या लिख पाते।

अंत में, कल ही मेरे मित्र अरुण कुमार मिश्रा जी ने मेरे एक गीत की याद दिलाई, कवि के लिए इससे बड़ी बात क्या हो सकती है, सो आज ही, छोटा सा वह गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

बनवासी राम की तरह 

पांवों से धूल झाड़कर,

पिछले अनुबंध फाड़कर

रोज जिए हम-

बनवासी राम की तरह। 

छूने का सुख न दे सके- 

रिश्तों के धुंधले एहसास, 

पंछी को मिले नहीं पर- 

उड़ने को सारा आकाश। 

सच की किरचें उखाड़कर, 

सपनों की चीरफाड़ कर, 

टांक लिए भ्रम,

गीतों के दाम की तरह। 

आज इतना ही सहन कर लीजिए, नमस्कार।

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