56. दैर-ओ-हरम में बसने वालो —

यह जानकर, हर किसी को अच्छा लगता है कि कुछ लोग हमको जानते हैं। लेकिन दुनिया में हर इंसान अलग तरह का है, कितने लोग वास्तव में ऐसे होते हैं, जो किसी व्यक्ति को ठीक से जानते हैं।

कुछ लोग हैं, जो हमारे साथ मुहल्ले में रहते हैं, वे हमें इस लिहाज़ से जानते हैं कि हम किस प्रकार के पड़ौसी हैं, कैसे नागरिक हैं, सामुदायिक गतिविधियों में क्या हमारी कोई भूमिका होती है?

इसी प्रकार में दफ्तर में हमारे साथ काम करने वाले, हमको हमारे पद, विभाग और अन्य लोगों के साथ हमारे व्यवहार, दफ्तर में होने वाली गतिविधियों में हमारी भागीदारी तथा एक कर्मचारी के रूप में हमारी भूमिका उनको किस प्रकार प्रभावित करती है अथवा हमारी कैसी छवि बनाती है, उसके आधार पर जानते हैं।

एक और आधार होता है लोगों के मन में हमारी छवि बनाने का, यह आधार कुछ जगहों पर बहुत प्रभावी होता है, जैसे बिहार में जब मैं कार्यरत था तब एक अधिकारी बता रहे थे कि उनको वहाँ के कोई स्थानीय पत्रकार मिले और उनसे पूछा, जी आप कौन हैं? अब पत्रकार तो काफी जागरूक माने जाते हैं। उन्होंने अपना नाम बताया, वो संतुष्ट नहीं हुए, पद बताया वे नहीं माने, उन्होंने कहा कि मैं अमुक स्थान का रहने वाला हूँ, इंसान हूँ, वो फिर बोले वैसे आप क्या हैं?  वैसे मतलब, उन्होंने पूछा, तब पत्रकार महोदय बोले, आपकी जाति क्या है जी!

कुछ लोगों के लिए यह जानकारी सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है। आप अच्छे इंसान हैं या नहीं, जहाँ आप हैं, आप अपनी भूमिका का निर्वाह कितनी ज़िम्मेदारी से, कितनी इंसानियत के साथ करते हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं होता कुछ लोगों के लिए, पहले तो आपका धर्म और उसके बाद आपकी जाति, यही दो बातें उनके लिए महत्वपूर्ण होती हैं।

तो इस आधार पर अगर पूछा जाए कि मैं क्या हूँ, तो मुझे बताना होगा कि मैं हिंदू हूँ, ब्राह्मण हूँ। हालांकि इन दोनों पहचानों को विकसित करने में मेरी कोई भूमिका नहीं है। मेरा यज्ञोपवीत संस्कार विवाह से पहले तो कभी हुआ नहीं, विवाह के समय पंडित जी ने जनेऊ पहनाया था, जो मैंने आयोजन के बाद उतार दिया और उसके पहले अथवा बाद में कभी नहीं पहना। ईश्वर में मेरी गहरी आस्था है, लेकिन मैं कभी-कभार औपचारिक आयोजनों के अलावा कभी पूजा-पाठ नहीं करता।

मैं अक्सर देखता हूँ कि ब्राह्मण महासभा, क्षत्रिय महासभा आदि-आदि अनेक आयोजन होते रहते हैं, वास्तव में जहाँ यह भाव पनपना चाहिए कि सभी मनुष्य एक जैसे हैं, सभी का उनके गुणों के आधार पर सम्मान होना चाहिए, इस प्रकार के आयोजन आपस में विभाजन पैदा करने वाले होते हैं। आज आधुनिक समय की मांग है कि इंसानों को बांटने वाले इस प्रकार के संगठनों को समाप्त किया जाए।

न किसी धर्म के नाम पर, न जाति के नाम पर, अगर लोग इकट्ठा होते हैं, तो वे मानव-जाति के नाम पर एकत्र हों।

मुझे जगजीत सिंह जी की गाई एक गज़ल याद आ रही है, इस मौके पर-

दैर-ओ-हरम में बसने वालो

मय-ख्वारों में फूट न डालो।

तूफां से हम टकराएंगे

तुम अपनी कश्ती को संभालो।

आरिज़-ओ-लब सादा रहने दो

ताजमहल पर रंग न डालो।

मैखाने में आए वाइज़,

इनको भी इंसान बना लो।

नमस्कार।

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