आज एक बार फिर संगीत, विशेष रूप से गज़ल की दुनिया की बात कर लेते हैं। भारतीय उप महाद्वीप में जब गज़ल की बात चलती है तब अधिकतम स्पेस गुलाम अली जी और जगजीत सिंह जी घेर लेते हैं। हालांकि इनसे बहुत पहले बेगम अख्तर जी से गज़ल गायकी लोकप्रिय हुई थी। इसके बाद जिस नाम को सबसे ज्यादा शोहरत मिली, वो थे पाकिस्तान के मेहंदी हसन साहब। एक समय था जब गज़ल की दुनिया में उनका कोई मुकाबला नहीं था।

सुना है गुलाम अली साहब, जो मेहंदी हसन जी के साथ तबला बजाते थे, उन्होंने उनसे कहा- उस्ताद मैं भी गाना चाहता हूँ, इस पर मेहंदी हसन बोले आप तबला बजाओ, यही ठीक है। लेकिन बाद में एक समय ऐसा आया कि गुलाम अली जी ने लोकप्रियता के मामले में, मेहंदी हसन साहब को पीछे छोड़ दिया। वैसे मेहंदी हसन साहब का अपना एक बहुत ऊंचा मुक़ाम था। उनकी एक लोकप्रिय गज़ल के कुछ शेर याद आ रहे हैं, जिनमें उनकी गायकी की विशेष झलक मिलती है-

देख तो दिल कि जां से उठता है,

ये धुआं सा कहाँ से उठता है।

यूं उठे आज उस गली से हम,

जैसे कोई जहाँ से उठता है।

बैठने कौन दे भला उसको,

जो तेरे आस्तां से उठता है।

इसके बाद तो गज़ल की दुनिया में गुलाम अली जी और जगजीत सिंह जी छाए रहे। गुलाम अली जी ने जहाँ सीमित साज़ों के साथ अपनी गायकी की धाक जमाई, वहीं जगजीत सिंह जी ने अच्छी गायकी के साथ, आर्केस्ट्रा का भी भरपूर इस्तेमाल किया है।

इनकी गज़लों में से कोई एक दो शेर चुनना तो बहुत मुश्किल है, लेकिन फिर भी कुछ उदाहरण दे रहा हूँ|  पहले जगजीत सिंह जी की गाई गज़ल के प्रसिद्ध शेर, जिनमें उनकी गायकी की झलक मिलती है-

जवां होने लगे जब वो तो हमसे कर लिया परदा,

हया बरलक्स आई और शबाब आहिस्ता-आहिस्ता।

एक और-

होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज़ है,

इश्क कीजे फिर समझिए, ज़िंदगी क्या चीज़ है।

या फिर-

दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है,

मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है।

अब गुलाम अली जी-

छेड़कर तब्सिरा ए दौर ए जवानी रोया,

रात यारों को सुनाकर मैं, कहानी रोया।

जब भी देखी है किसी चेहरे पे एक ताज़ा बहार,

देखकर मैं तेरी तस्वीर पुरानी रोया।

एक और-

सो गए लोग उस हवेली के,

 एक खिड़की मगर खुली है अभी।

कुछ तो नाज़ुक मिजाज़ हैं हम भी,

और ये चोट भी नई है अभी।

अब गज़ल की दुनिया में तो इतने लोग हैं कि कुछ नाम ले लूं, तो ये होगा कि बहुत सारे छूट जाएंगे। मेरे प्रिय फिल्मी गायक मुकेश जी ने भी कुछ गज़लें गाई हैं, एक गज़ल के एक दो शेर याद आ रहे हैं-

जरा सी बात पे, हर रस्म तोड़ आया था,

दिल-ए-तबाह ने भी क्या मिजाज़ पाया था।

शगुफ्ता फूल सिमटकर कली बने जैसे,

कुछ इस कमाल से तूने बदन छुपाया था।

गुज़र गया है कोई लम्हा-ए-शरर की तरह,

अभी तो मैं उसे पहचान भी न पाया था।

एक गज़ल चंदन दास जी की गाई हुई मुझे बहुत अच्छी लगती है-

अपना गम लेके कहीं और न जाया जाए,

घर की बिखरी हुई चीज़ों को सज़ाया जाए।

घर से मस्ज़िद है बहुत दूर चलो यूं कर लें,

किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए।

असल में गाने वाले तो इतने हैं, और फिल्मों में बहुत अच्छी गज़लें आई हैं, उनका ज़िक्र करते हुए कई ब्लॉग लिखे जा सकते हैं, रफी साहब ने बहुत अच्छी गज़लें गाई हैं, जैसे-

रंग और नूर की बारात किसे पेश करूं

ये मुरादों की हसीं रात किसे पेश करूं।

अनूप जलोटा जी ने भजनों के अलावा बहुत सी गज़लें भी गाई हैं, उनमें से कुछ काफी अच्छी बन पड़ी हैं। जैसे एक है-

अशआर मेरे यूं तो ज़माने के लिए हैं,

कुछ शेर फक़त तुमको सुनाने के लिए हैं।

आंखों में जो रख लोगे तो कांटों से चुभोगे,

ये ख्वाब तो पलकों पे सज़ाने के लिए हैं।

एक गज़ल जिसमें काफी दर्द उभरा है, जो भोगा हुआ यथार्थ लगता है! जैसा सुना है कि रूप कुमार राठौर, अनूप जलोटा के साथ तबला बजाते थे और अनूप जी और सोनाली जलोटा, एक साथ गाते थे। बाद में सुरों का तालमेल कुछ ऐसा हुआ कि सोनाली जलोटा, रूप कुमार राठौर के साथ मिलकर सोनाली राठौर बन गईं और उनका सिंगिंग पेयर बन गया। इसके बाद अनूप जी ने ये गज़ल गाई थी, जिसमें पूरा दर्द उभरकर आया है-

जब से गए हैं आप, किसी अजनबी के साथ,

सौ दर्द जुड़ गए हैं, मेरी ज़िंदगी के साथ।

खैर ये किस्सा तो चलता ही जाएगा, क्योंकि गाने वाले एक से एक हैं, और बहुत अच्छे हैं, कुछ का नाम लेना ठीक नहीं रहेगा। फिर कभी बात करेंगे और लोगों के बारे में, आज के लिए इतना ही।

 

नमस्कार।

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