हम मनाने जा रहे हैं अपना स्वतंत्रता दिवस, अपना स्वाधीनता दिवस, 70 वर्ष पूर्व 15 अगस्त, 1947 को हमारा देश आज़ाद हुआ था, 200 वर्षों की अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद। फिर हमने कहा कि हम अब स्वयं के आधीन हैं, पराधीन नहीं हैं, लेकिन स्वच्छंद भी नहीं हैं। स्वच्छंदता की स्थिति तो अराजकता की होती है, जहाँ कोई भी सरफिरा कह सकता है कि ये मांगे आजादी और वो मांगे आजादी।

हम  स्वाधीन हैं, अपनी स्वाधीनता को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए हमने एक तंत्र विकसित किया, जिसके केंद्र में आम नागरिक हैं, इसके लिए हमने 26 जनवरी, 1950 को अपना संविधान अंगीकार किया, और हम एक स्वतंत्र गणतंत्र बने, गणराज्य बने।

स्वाधीनता एक ऐसा मूल्य है, जिसको पहचानना ज़रूरी है, वर्ना हमारे यहाँ जहाँ हजारों, लाखों देशभक्त हुए हैं, वहाँ गद्दार भी कम नहीं हुए हैं। इन गद्दारों के लिए जहाँ अपना व्यक्तिगत लाभ सर्वोपरि होता है, वहीं कुछ ऐसे विद्वान भी हैं, जिनकी विचारधारा उन्हें बताती है कि राष्ट्र, देशभक्ति आदि की अवधारणाएं, बहुत छोटी बातें हैं, वे तो  अंतर्राष्ट्रीय नागरिक हैं, इत्तफाक से हिंदुस्तान जैसे दकियानूसी देश में पैदा हो गए हैं, अन्यथा अपने नज़रिए के मामले में तो वे सार्वदेशिक हैं।

वे हिन्दुस्तान में वह व्यवस्था, वह निज़ाम लाना चाहते हैं, जिसको उनके गुरुजन रूस में और चीन में लागू न कर पाए। एक ऐसी विचारधारा जो पूरी दुनिया से मिटकर केवल भारत और नेपाल जैसे कुछ देशों में सिमट गई है। ऐसी विचारधारा, जिसके कारण उनकी यह कहने की भी हिम्मत नहीं हुई कि चीन ने भारत पर हमला किया है। मुझे अचंभा होता है कि ऐसी विचारधारा आज भी अस्तित्व में कैसे है!

दरअसल जैसे जहाँ गंदगी होती है वहाँ मच्छर पनपते हैं, उसी प्रकार जहाँ गरीबी होती है, वहाँ कम्युनिज़्म पनपता है। खास तौर पर युवाओं पर इसका अधिक असर अधिक होता है। एक बात यह भी है कि मार्क्सवाद की, कम्युनिज़्म की जो अवधारणा है, वह निश्चित रूप से काफी आकर्षक है, जो नारे हैं वे बहुत प्रभावित करते हैं, खास तौर पर वंचितों को, शोषितों को, लेकिन इस विचारधारा ने दुनिया को क्या दिया है? जो लोग इस गैस चैंबर से बाहर निकले हैं, वे ही जानते हैं। वे दुबारा इस तरफ कभी नहीं जाना चाहेंगे।

जहाँ तक विचार की बात है, बहुत से श्रेष्ठ कवि, फिल्मकार, उपन्यासकार इस विचारधारा के हुए हैं, जिन्होंने बहुत अच्छा साहित्य और फिल्में हमें दी हैं, इसलिए मूलभूत विचार से मेरा विरोध नहीं है, अभी दो दिन पहले ही जब श्री सीताराम येचुरी राज्यसभा से रिटायर हुए, तब उनकी विदाई के अवसर श्री अरुण जेटली ने कहा कि क्योंकि श्री येचुरी कभी, सत्ता में नहीं रहे, अतः उनके पास ऐसी सुविधा है, और प्रतिभा भी है कि वे अक्सर ऐसे समाधान प्रस्तुत करते हैं जो सुनने में आकर्षक लगते हैं लेकिन व्यावहारिक नहीं होते।  और यह भी सच्चाई है कि जहाँ कम्युनिज़्म की विचारधारा ने बहुत अच्छा साहित्य दिया है, वहीं जिन लोगों ने कम्युनिस्ट निज़ाम को झेला है, उनका साहित्य उससे भी अधिक झकझोर देने वाला है।

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित शैक्षिक संस्थानों में कांग्रेस सरकार के निकम्मेपन के कारण कम्युनिस्टों ने जो अपनी छावनियां बनाईं, उनके कारण देश की प्रगति में कोई योगदान नहीं होने वाला बल्कि अराजकता का माहौल ही पनप सकता है। (यहां मैं उन छात्रों का ही उल्लेख कर रहा हूँ, जो कम्युनिस्टों के काडर के लिए डेवलप किए जा रहे हैं, हालांकि बाकी लोगों पर भी थोड़ा बहुत प्रभाव तो पड़ता ही है। ,

मैंने एक साधारण कवि के रूप में भी यह अनुभव किया है और झेला है कि काव्य-मंचों पर आसीन कम्युनिस्ट मठाधीश, किसी कवि को तब तक मान्यता नहीं देते, जब तक यह नहीं जान लेते कि वह कम्युनिस्ट विचारधारा का है।

एक उदाहरण दिया जाता है कि रूस के अगली पीढ़ी के नेता लेनिन की कमियां बता रहे थे कि उन्होंने ये गलत किया और वो गलत किया, भीड़ में से एक व्यक्ति बोला कि उस समय आप कहाँ थे? उन्होंने पूछा कौन बोल रहे हैं हाथ उठाइए, कोई नहीं बोला, इस पर वे बोले कि मैं वहीं था जहाँ इस समय आप हैं।

मुखर विरोध की, स्वतंत्र अभिव्यक्ति की बात भारत में उस विचारधारा के लोग सबसे ज्यादा करते हैं, जो थ्यानमन चौक की घटना के लिए ज़िम्मेदार है, जिसमें अपनी आवाज़ बुलंद करने वाले हजारों युवा मारे गए थे। एक ऐसी विचारधारा जिसमें विरोध की इजाज़त ही नहीं है। जहाँ असहमति को प्रतिक्रियावाद कहा जाता है।

इस विचारधारा को थोड़ा सुधारकर भारत में समाजवाद का आंदोलन चला, लोहिया जी, जयप्रकाश जी उसके नायक बने, लेकिन उस विचारधारा की डोर ही आज देश में लालू और मुलायम जैसे लोगों के हाथ में है, अब इनसे क्या उम्मीद की जा सकती है।

मेरा स्पष्ट मानना है कि कम्युनिज़्म केवल अव्यवस्था फैलाने का विशेषज्ञ है, वे मानते जो व्यवस्था है, वह समाप्त होगी तभी नई व्यवस्था आएगी, यह चक्रव्यूह में प्रवेश करने के अधूरे ज्ञान जैसा है।

मैं यह मानता हूँ कि पश्चिमी बंगाल में कम्युनिस्टों को जितने लंबे समय तक शासन करने का अवसर मिला, वह भारत में इस एक्सपेरिमेंट को करने के लिए बहुत अधिक था। क्या हासिल हुआ वहाँ पर! आज वह राज्य हर दृष्टि से पिछ्ड़ा हुआ है। कोई उद्योग वहाँ नहीं बचा है। कोई वहाँ उद्योग लगाना भी नहीं चाहता।  

अंत में स्वाधीनता दिवस के अवसर पर, मुकेश जी के गाए एक गीत की कुछ पंक्तियां याद कर लेता हूँ-

छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी,

नए दौर में लिखेंगे हम मिलकर नई कहानी,

हम हिंदुस्तानी।

आज पुरानी जंजीरों को तोड़ चुके हैं,

क्या देखें उस मंज़िल को, जो छोड़ चुके हैं,

चांद के दर पे जा पहुंचा है आज ज़माना,

नए जगत से हम भी नाता जोड़ चुके हैं,

नया खून है, नई उमंगे, अब है नई जवानी,

हम हिंदुस्तानी।

नमस्कार।

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