जिस प्रकार मौसम पर बात करना बहुत आसान सा काम होता है, टाइम पास वाला काम, अगर आप इसको भी काम कहना चाहें, उसी प्रकार अपने मुहल्ले के बारे में बात करना भी एक अच्छा टाइम-पास होता था, विशेष रूप से महिलाओं के लिए। ये उस समय की बात है, जब मुहल्ले हुआ करते थे, जीवंत मुहल्ले, जिनमें लोगों को एक-दूसरे की ज़रूरत भी काफी होती थी और एक-दूसरे से समस्या भी काफी होती थी।

कुल मिलाकर ये कि जब तक एक-दूसरे से अक्सर बात न करें और यदा-कदा लड़ाई भी न करें, तब तक ये लगता ही नहीं था कि हम मुहल्ले में रह रहे हैं। वह अपनी अच्छाइयों और कमियों के साथ, सामाजिकता का ऐसा माहौल था, जिसमें बहुत हद तक हम एक-दूसरे के पूरक होते थे, सहायक भी होते थे और ऐसा नहीं होता था, जैसा आजकल होने का डर रहता है।

एनटीपीसी में अपनी सेवा के दौरान मेरा एक लगभग नियमित सा काम था कर्मचारियों तथा बच्चों के बीच विभिन्न प्रतियोगिताएं कराना। एक बार शायद बाल भवन के लिए किसी विषय पर बच्चों की प्रतियोगिता कराई थी, उसमें अपने निबंध में एक बच्चे ने चार-पांच बार ‘आत्महत्या’ का ज़िक्र किया। निबंध का विषय ऐसा नहीं था, हम ऐसा विषय रखते भी नहीं थे, फिर क्यों उसने चार-पांच बार ‘आत्महत्या’ का ज़िक्र किया, समझ में नहीं आया। मैंने अपने मानव संसाधन विभाग के साथी, जिनको मैंने कॉपी जांचने का काम सौंपा था और वास्तव में जिन्होंने इस तथ्य से मुझे परिचित कराया था, उनसे कहा कि उस बच्चे के माता-पिता को इस बारे में बताकर सचेत करें कि कहीं उस बच्चे के मन में इस प्रकार की घोर निराशापूर्ण सोच तो नहीं पनप रही है!  

आज का जीवन इतना जटिल और एकाकी हो गया है, न तो वे मुहल्ले हैं, जो अगर आज के लिहाज से सोचें तो हमारी निजता के क्षेत्र में जबरन घुस जाते हैं और न वे संयुक्त परिवार है जिसमें किसी का एकाकी होना संभव ही नहीं था।

सेवा के दौरान ही ऐसे कई मामले सामने आए जिसमें किसी स्कूली छात्र अथवा छात्रा ने आत्महत्या कर ली और इसका किसी परीक्षा परिणाम से भी संबंध नहीं था। परिवार और समाज, इस मामले में स्कूल के साथियों की भीड़ के बीच कोई अपनी एकाकी सोच में इतना दूर निकल जाए, यह बड़ी हैरत की और दर्दनाक बात है। काश ऐसी किसी घटना के घटित होने से पहले इस समस्या की भनक आसपास के लोगों को लगी होती, तो शायद ऐसी घटनाओं को टाला जा सकता था।

अब मैं भी अपने निबंध को आत्महत्याओं पर केंद्रित नहीं करूंगा। मैंने छात्रों के इन मामलों का ज़िक्र इसलिए किया कि इनमें अंत तक कारणों का पता नहीं चल पाया। मैं इतना ही कहना चाह रहा हूँ कि अनावश्यक दखल तो हमारी ज़िंदगी में दूसरों का नहीं होना चाहिए, परंतु इस प्रकार का दखल तो होना ही चाहिए, जिसे परवाह कहते हैं, जिससे ऐसा न हो कि बगल के फ्लैट से जब बदबू आए, तभी उसको खोला जाए और मालूम हो कि हमारे पड़ौसी कब के स्वर्ग सिधार चुके हैं, और यह कब हुआ इसकी जानकारी भी हमको नहीं हो पाई।  

मैंने जब मुहल्ले की बात शुरू की, उस समय मैं असल में आज के नए मुहल्ले, सोशल मीडिया की बात करने वाला था, लेकिन फिर मुझे एक छात्र का लिखा निबंध और कुछ ऐसी घटनाएं याद आ गईं। सोशल मीडिया वाली बात फिर कभी कर लेंगे।

आज हम यह भी देखते हैं कि बहुत से बुज़ुर्ग, आलीशान बंगलों में या फ्लैट्स में अकेले रहते हैं,  पड़ौसी तो अपने जीवन में मस्त रहते हैं, अक्सर आजकल आपस में ठीक से परिचय भी नहीं हो पाता। ऐसे में जो दुष्ट प्रकृति के लोग हैं, लुटेरे हैं- उनकी निगाह इन एकाकी लोगों पर जमी रहती है, खास तौर पर अगर उनके यहाँ काम करने वालों के माध्यम से उनकी अच्छी माली हालत का पता चल जाए तब! ऐसे में एक जीवंत समाज के रूप में क्या हम अपने उन एकाकी पड़ौसियों की सुरक्षा की तरफ थोड़ा ध्यान नहीं दे सकते?

एक जीवंत समाज के रूप में शायद समय अब समय आ गया है कि हमें अपनी ज़िम्मेदारी के प्रति सचेत हो जाना चाहिए और यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि ऐसी घटनाएं आगे न हो पाएं।

आज श्री रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ-

मेरे पंख कट गये हैं
वरना मैं गगन को गाता।

कोई मुझे सुनाओ
फिर से वही कहानी,
कैसे हुई थी मीरा
घनश्याम की दीवानी।
मीरा के गीत को भी
कोई विष रहा सताता।

कभी दुनिया के दिखावे
कभी खुद में डूबता हूँ,
कुछ देर ख़ुश हुआ तो
बड़ी देर ऊबता हूँ।

मेरा दिल ही मेरा दुश्मन
कैसे दोस्ती निभाता!

मेरे पास वह नहीं है
जो होना चाहिए था,
मैं मुस्कराया तब भी
जब रोना चाहिए था।
मुझे सबने शक से देखा
मैं किसको क्या बताता?

वह जो नाव डूबनी है
मैं उसी को खे रहा हूँ,
तुम्हें डूबने से पहले
एक भेद दे रहा हूँ।
मेरे पास कुछ नहीं है
जो तुमसे मैं छिपाता।

नमस्कार।

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