आज एक वृतांत सुना रहा हूँ जो मैंने दिल्ली में अपने एक मित्र और सहकर्मी से सुना था, मेरे ये मित्र मूलतः मुल्तान के रहने वाले थे, मुझसे कुछ पहले ही रिटायर हो चुके हैं और अभी दिल्ली में रह रहे हैं। दो किस्से हैं, सच्ची घटनाएं जो उनको, उनके दादाजी ने सुनाई थीं। उस समय की घटनाएं हैं जब वे (दादाजी) मुल्तान में रहते थे, देश की आज़ादी से काफी पहले की घटनाएं हैं।  

मेरा अपने मित्र पर पूरा विश्वास है, जैसा उनका अपने दादाजी पर था, इसलिए मैं इनको सच्ची घटना के रूप में सुना रहा हूँ, आप चाहें तो इनको किस्से के रूप में सुन लीजिए।

तो पहली घटना, जो दादाजी के मित्र के सामने हुई और उसने उनको बताई, वह मित्र जंगल के बीच से जा रहा था जहाँ मार्ग के दोनों तरफ मिट्टी के ऊंचे-ऊंचे दीवारनुमा टीले थे और उन टीलों में काफी ऊंचाई तक सूराख बने हुए थे, सर्प के बिल जैसे। उस व्यक्ति ने देखा कि एक तरफ के टीले के सूराख में से एक पतला सा सर्प, हरे रंग का निकला और दूसरी तरफ के टीले के सूराख मे घुस गया। इतना में उधर दो साधु वेशधारी व्यक्ति आए, उन्होंने उससे पूछा कि क्या उन्होंने देखा है कि सर्प कौन से सूराख में घुसा है, उस व्यक्ति ने उनको बता दिया।

उन लोगों ने बताया कि वह इच्छाधारी सर्प है, उनके पास एक तसले में गोबर भरा हुआ था वे गोबर को उस सूराख पर डालने लगे जिसमें वह सर्प घुसा था। जैसे ही वे गोबर डालते वह जल जाता, वे पुनः गोबर डालते, इस प्रकार काफी देर तक चलता रहा, अंत में गोबर जलना बंद हो गया, इसके बाद उनमें से एक साधु ने उस बिल (सूराख) के अंदर हाथ डाला और उस पतले से हरे रंग के सर्प को बाहर निकाल लिया।

उनके पास एक दूसरा साफ तसला भी था और उनमें से एक ने उस सर्प को सीधा उस तसले के ऊपर लटका लिया और सीधा उसको दबाकर  ऊपर से नीचे तक अपना हाथ ले आए, जिससे उसका सारा रक्त उस तसले में आ गया। उनमें से एक ने वह रक्त पिया और वह अदृश्य हो गया, उसके बाद दूसरे ने उस तसले में बाकी बचे रक्त को चाट लिया और वह भी अदृश्य हो गया। इसके बाद उन सज्जन ने केवल उनके जाते समय, उनके धन्यवाद का स्वर सुना।

मुझे यह किस्सा सुने 40 वर्ष से ऊपर हो गए, उस समय की बात है जब मैं दिल्ली में नौकरी करता था और दिल्ली मैंने 1980 में छोड़ दी थी। मेरे मित्र के दादाजी ने कब ये किस्सा सुनाया होगा पता नहीं और घटना तो लगता है लगभग 100 वर्ष पुरानी होगी!

आज अचानक याद आया तो शेयर कर लिया, आप चाहें इसे जिस भी रूप में लें। दूसरा किस्सा भी काफी रोचक है यद्यपि उसमें किसी के गायब होने की बात नहीं है, अब अगला झटका थोड़ा रुककर देते हैं न!  

नमस्कार।

****************