103. किसी का प्यार क्या तू, बेरुखी को तरसे!

आज धर्मेंद्र जी के बारे में बात करने का मन हो रहा है। वैसे कोई किसी का नाम ‘धर्मेंद्र’ बताए तो दूसरा पूछता इसके आगे क्या है, शर्मा, गुप्ता, वर्मा, क्या? मगर अभिनेता धर्मेंद्र के लिए इतना नाम ही पर्याप्त है।

वैसे उनके बेटों के नाम के साथ जुड़ता है- देओल, लेकिन धर्मेंद्र अपने आप में संपूर्ण हैं। बेशक एक सरल, महान और मेहनती कलाकार हैं। सफल फिल्मों की एक लंबी फेहरिस्त है उनके नाम। भारतीय रजत पट की ‘स्वप्न सुंदरी’ कही जाने वाली हेमा जी से विवाह किया उन्होंने, अपनी पारंपरिक पत्नी के अलावा, जो सनी और बॉबी देओल की मां हैं।

शुरू में जब धर्मेंद्र फिल्मों में आए थे, तब वे ‘ही मैन’ के रूप में जाने जाते थे, मेहनती कलाकार शुरू से हैं, धीरे-धीरे उनकी कला निखरती गई और उनकी एक से एक अत्यंत सफल फिल्में पर्दे पर आईं। धर्मेंद्र जी की कुछ प्रमुख फिल्में हैं- बंदिनी, सत्यकाम, काजल, शोले, आए दिन बहार के, फूल और पत्थर, अनुपमा, चंदन का पलना, मेरे हमदम मेरे दोस्त, आया सावन झूम के, मेरा नाम जोकर, शराफत, गुड्डी, मेर गांव मेरा देश, राजा जानी, सीता और गीता, यादों की बारात, चुपके चुपके आदि आदि।

फिल्म सत्यकाम में उनका अभिनय बहुत जोरदार था, इसी प्रकार शोले, मेरा नाम जोकर में, कुछ फिल्मों में उन्होंने जोरदार कॉमेडी भी की है जिनमें अमिताभ के साथ उनकी फिल्म ‘चुपके चुपके’ भी शामिल है।

आज अचानक धर्मेंद्र जी का खयाल क्यों आया यह बता दूं। आजकल एक विज्ञापन आता है किसी प्रोडक्ट का, जिसमें धर्मेंद्र जी आते हैं, वे कहते हैं- ‘मेरी तरह फिट रहना है, तो —— का इस्तेमाल करें। सचमुच समय बहुत बलवान है, धर्मेंद्र जी जो वास्तव में मर्दानगी की, जवानी की एक मिसाल हुआ करते थे, इस विज्ञापन में, बुढ़ापे की पहचान बने दिखाई देते हैं, और जिस अंदाज़ में वे इस विज्ञापन में दिखाई देते हैं, उसको देखकर थोड़ा झटका लगता है।

उनकी फिल्म सत्यकाम के एक गीत की अंतिम पंक्तियां याद आ रही हैं, जो इस तरह हैं-

आदमी है बंदर.. रोटी उठा के भागे
कपड़े चुरा के भागे, कहलाये वो सिकंदर
बंदर, आदमी है बंदर..

आदमी है चरखा.. छू छू हमेशा बोले
चूं चूं हमेशा डोले, रुकते कभी ना देखा..
आदमी है चरखा..
बंदर नहीं है, चरखा नहीं है, आदमी का क्या कहना
प्यार मोहबत फितरत उसकी दोस्ती मज़हब उसका
दोस्ती है क्या बोलो दोस्ती है क्या

दोस्ती है लस्सी—-

दोस्ती है रस्सी—–

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लस्सी नहीं है, रस्सी नहीं है

दोस्ती दिल की धड़कंन,

दुश्मनी है सहरा सहरा तो

दोस्ती गुलशन-गुलशन।

एक और गीत, जो धर्मेंद्र जी के नाम से याद आता है, वो है-

मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे

मुझे गम देने वाली, तू खुशी को तरसे।

तू फूल बने पतझड़ का, तुझ पे बहार न आए कभी,

मेरी ही तरह तू तरसे, तुझको क़रार न आए कभी।

जिये तू इस तरह कि, ज़िंदगी को तरसे।

तेरे गुलशन से ज्यादा, वीरान कोई वीराना न हो,

इस दुनिया में कोई तेरा, अपना तो क्या बेगाना न हो,

किसी का प्यार क्या तू, बेरुखी को तरसे!

खैर इस विज्ञापन के बहाने ही, इस महान कलाकार और सरल हृदय इंसान की याद आई, मैं उनके स्वस्थ और दीर्घ जीवन की कामना करता हूँ।

 

नमस्कार।

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