104. शत्रु भैया के बहाने!

शत्रु भैया, याने शत्रुघ्न सिन्हा जी के बहाने बात कर लेते हैं आज। बहुत अच्छे अभिनेता रहे हैं, किसी समय इनकी मार्केट अमिताभ जी से ज्यादा थी, लेकिन जैसा वे कहते हैं कुछ गलत निर्णय और सब कुछ हाथ से निकल गया।

मैं, पटना के कदम कुआं में, शत्रु भैया के पड़ौस में तो होकर आया हूँ एक बार। एक बहुत श्रेष्ठ कवि हैं- सत्यनारायण जी, वे शत्रु भैया के पड़ौसी और बचपन के दोस्त भी हैं। शायद शत्रु जी की किसी फिल्म में उनके लिखे गीत भी शामिल किए गए हैं।

सत्यनारायण जी श्रेष्ठ कवि होने के अलावा श्रेष्ठ संचालक भी रहे हैं। मैंने उनका संचालन हिंदुस्तान कॉपर में सेवा करते हुए देखा था और उसके बाद एक बार एनटीपीसी विंध्यनगर में और एक बार एनटीपीसी ऊंचाहार में भी उनको बुलाया था। बहुत समय से उनसे संपर्क नहीं रहा, मेरी कामना है कि वे स्वस्थ हों।

बहरहाल विंध्यनगर वाले कवि सम्मेलन में जहाँ नीरज जी भी थे और उन्होंने भी सत्यनारायण जी की तारीफ की थी, वहीं ऊंचाहार के कवि सम्मेलन तक आते-आते महसूस हुआ कि अब सत्यनारायण जी के संचालन का नहीं अपितु डॉ. कुमार विश्वास के संचालन का समय आ गया है। दोनों में फर्क देखें तो कुछ वैसा ही है, जैसे दूरदर्शन और आधुनिक चैनलों में है, जहाँ न्यूज़ को ईवेंट बना दिया जाता है।

खैर मैं आज की बातचीत ‘छेनू’ जी याने शत्रु बाबू के बहाने कर रहा था। उन्होंने ढेर सारी फिल्मों में काम किया, बहुतों को खामोश किया, ‘बिहारी बाबू’ के नाम से उनको भारी ख्याति मिली, बाद में वे राजनीति में आए और बीजेपी के लिए स्टार- प्रचारक बने, केंद्र में मंत्री भी रहे।

लंबे अंतराल के बाद जब फिर से बीजेपी की सरकार आई तब तक, राजनीति में शत्रु भैया के सितारे बदल चुके थे, शायद उम्र भी उनके पद पाने में आड़े आ गई और किसी बड़े पद के बिना, पार्टी में पूरे मन से रहना शायद शत्रु भैया को ठीक नहीं लगा। नतीज़ा कि वे आज बीजेपी में ‘खलनायक’ की भूमिका निभा रहे हैं, पार्टी में हैं, लेकिन पार्टी के खिलाफ बोलने का कोई मौका नहीं छोड़ते। मेरा स्पष्ट मत है कि अगर आपको कोई पार्टी या संगठन पसंद है तो उसके साथ रहो, पसंद नहीं है तो अलग हो जाओ, ऐसा क्या कि वे भी बैठे हैं और पार्टी ने भी अपने भीतर एक ‘शत्रु’ को आदर के साथ बिठा रखा है।

खैर यही कारण है कि मैं आज की तारीख में शत्रु जी को राजनीति में एक खलनायक मानता हूँ। लेकिन मुझे लगता है कि शायद परिस्थितियां उनको इस स्थिति में ले आई हैं।

अभी इंडिया टुडे के प्रोग्राम ‘साहित्य आज तक’ में शत्रु जी के बारे में एक बात जानकर बहुत अच्छा लगा। शायद उन्होंने कोई किताब लिखी है, उसी के प्रसंग में मालूम हुआ कि वे बहुत भावुक हैं और गायक ‘मुकेश’ जी से उनको बहुत लगाव था। इतना कि मुकेश जी के अंतिम संस्कार में जाने के लिए वे घर से निकले, लेकिन आधे रास्ते से लौट गए, क्योंकि उनको लगा कि वे वहाँ अपने आपको नहीं संभाल पाएंगे।

जो व्यक्ति इतना भावुक है और विशेष रूप से मेरे प्रिय मुकेश जी से इतना प्यार करता, उसकी सौ कमियों को नजरअंदाज़ करते हुए मैं उसको सलाम करता हूँ।

 

नमस्कार।

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