अब नया मुद्दा रानी पद्मावती का मिल गया है, जिस पर देश भर के घटिया लोग एकजुट हो जाएंगे, हो गए हैं।

मैंने पहले भी लिखा है कि अगर आज मुंशी प्रेमचंद जिंदा होते तो न जाने कितने मुक़द्मे झेल रहे होते।

सबसे बड़ी बात यह है कि आज आप कोई बदतमीज़ी करो, किसी सार्वजनिक रुचि के मुद्दे को लेकर तो मीडिया पर आपको भरपूर कवरेज मिल जाती है। इन बदतमीज बहरूपियों को पब्लिसिटी चाहिए, किसी भी तरह और मीडिया को हर रोज़ कोई सनसनीखेज स्टोरी चाहिए, वे लोग ये भी नहीं सोच पाते कि मुफ्त में मिल रही इस पब्लिसिटी के चक्कर में ये लोग सार्वजनिक संपत्ति को भी नुक़सान पहुंचाते हैं।

अब मामला क्या है, रानी पद्मावती को लेकर एक फिल्म बनाई है भंसाली जी ने, फिल्म की शूटिंग के दौरान वे पिट भी चुके हैं, इन बेशर्म लोगों के हाथ, जिनमें से एक उस समय काफी आया था टीवी चैनलों पर, ऐसा लगता है टीवी पर आने के लिए ही भरपूर मेकअप करके आया था। पूरा बहरूपिया लग रहा था। मैं इन दो कौड़ी के लोगों का नाम भी याद नहीं रखना चाहता।

अब फिल्म किसी ने देखी नहीं है और भंसाली जी ये कह चुके हैं कि फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है जैसी आशंका जताई जा रही है।

अब अगर फिल्म में कुछ गलत है तो इसका फैसला कौन करेगा? क्या इसका फैसला सड़कों पर होगा? चुनाव भी होते रहते हैं कहीं न कहीं। ऐसे में राजनेता भी इन हुड़दंगियों के कारनामों के साथ जुड़ जाते हैं और उसको अपनी स्वीकृति दे देते हैं।

मुझे तो यही खयाल आता है कि रानी पद्मावती भी आज देखती होंगी तो उनको इस बात का अफसोस होगा कि कैसे घटिया लोग उनके नाम पर, अपना नाम चमका रहे हैं।

मेरे विचार में ऐसी परंपरा सुदृढ़ की जानी चाहिए, जिसमें समुचित संस्था/प्राधिकारी, किसी मामले में सही गलत का फैसला करें, जिसे सभी के द्वारा माना जाए और जो बेशऊर लोग, ऐसे मामलों पर उपद्रव करना चाहते हैं, उनके साथ शुरुआत होते ही कड़ाई से पेश आना चाहिए, जिससे सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए ज्यादा लोग इस उपद्रव में शामिल न हो पाएं।

पब्लिसिटी का नशा ऐसा चढ़ा कि क्षत्राणियां भी इस युद्ध में कूद चुकी हैं, कई बार ऐसे विवादों को फिल्म की पब्लिसिटी के लिए भी बढ़ावा दिया जाता है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि इसके लिए कोई मार खाने को भी तैयार हो जाएगा।

लेकिन ये हिंदुस्तान है, यहाँ कुछ भी हो सकता है।

नमस्कार

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