106. मेरे क़ातिल ने कहीं जाम उछाले होंगे!

अभिव्यक्ति, कविता, शेर-ओ-शायरी, ये सब ऐसे काम नहीं है कि जब चाहा लिख लिया और उसमें गुणवत्ता भी बनी रहे।

दो शेर याद आ रहे हैं इस संदर्भ में-

हम पे दुखों के पर्बत टूटे, तब हमने दो-चार कहे,

उसपे भला क्या बीती होगी, जिसने शेर हजार कहे।

              (डॉ. बालस्वरूप राही)

एक अच्छा शेर कहके, मुझको ये महसूस हुआ,

बहुत दिनों के लिए फिर से मर गया हूँ मैं।

                    (डॉ. सूर्यभानु गुप्त)

सचमुच जब कोई रचनाकार कोई अच्छी रचना लिखता है, शेर तो उसकी सबसे छोटी, लेकिन अपने आप में मुकम्मल इकाई है, तो उसके बाद यह चुनौती उसके सामने होती है कि इससे ज्यादा अच्छी रचना अपने पाठकों/श्रोताओं के सामने रखे।

बहुत अधिक कष्ट और चुनौतियां होती हैं ईमानदारी से प्रभावी अभिव्यक्ति को अंजाम देने के लिए। असल में एक अच्छा सृजनशील रचनाकार, दिल से एक अच्छा प्रेमी होता है, जो अक्सर पूरी दुनिया से प्रेम करता है।

मैं बसाना चाहता हूँ, स्वर्ग धरती पर,

आदमी जिसमें रहे बस आदमी बनकर,

उस नगर की हर गली तैयार करता हूँ।

आदमी हूँ, आदमी से प्यार करता हूँ॥

वैसे किसी एक व्यक्ति अथवा शक्ति के प्रति अनन्य प्रेम भी अद्वितीय रचनाओं का आधार बन सकता है, लेकिन ऐसे उदाहरण बहुत कम और दिव्य होते हैं, जैसे तुलसीदास और उनके ईष्ट श्रीराम, सूरदास और उनके दुलारे श्याम मनोहर।

खैर हम लौकिक सृजन के बारे में ही, हल्की-फुल्की बातें करेंगे। एक गज़ल जो गुलाम अली जी ने गाई है, लेखक हैं परवेज़ जालंधरी,बड़े सुंदर बोल हैं और बड़ी कठिन शर्तें हैं चाहत की-

जिनके होठों पे हंसी, पांव में छाले होंगे,

हाँ वही लोग तेरे चाहने वाले होंगे।

शमा ले आए हैं हम, जल्वागह-ए-जाना से

अब दो आलम में उजाले ही उजाले होंगे।

मय बरसती है, फज़ाओं में नशा तारीं है,

मेरे क़ातिल ने कहीं जाम उछाले होंगे।

हम बड़े नाज़ से आए थे तेरी महफिल में,

क्या खबर थी, लब-ए-इज़हार पे ताले होंगे।

आज के लिए इतना ही काफी है, वैसे तो कहते हैं ना- हरि अनंत, हरिकथा अनंता, साहित्य के बारे में भी ये बात लागू होती है।

नमस्कार

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4 comments

  1. सर मैंने एक लेख लिखा था पद्मावती को लेकर जिसमे मैंने पद्मावती को लेकर अपना नज़रिया पेश किया था ।

    1. मैंने आपका लेख पढा आयुष्मान जी, निश्चित रूप से भंसाली जी ने भी शुरु में पब्लिसिटी के बारे में सोचा होगा, लेकिन इस बार बात कुछ ज्यादा आगे निकल गई, जब अराजक भीड़ नेता बन जाए, वह कोई शुभ स्थिति नहीं है।

      1. पता नही सर् आने वाले समय का इंतेज़ार कर रहा बस , कुछ भी हो बस जान माल का नुकसान ना हो किसी का ।