आज बहादुर शाह ज़फर जी की एक गज़ल शेयर करने का मन हो रहा है।

अभिव्यक्ति की दुनिया में हम सब एक-दूसरे से जुड़े हैं। कुछ लोग सामान्य जीवन में ही स्वयं को पर्याप्त रूप से अभिव्यक्त करते रहते हैं। कुछ उसके अलावा कला के विभिन्न उपादानों का सहारा लेकर- कविता, पेंटिंग, अभिनय, नाटक-फिल्म आदि के माध्यम से खुद को अभिव्यक्त करते हैं।

आज सोशल मीडिया भी अभिव्यक्ति का एक बड़ा साधन बन गया है, जिसमें अभिव्यक्ति का ऐसा अवसर मिला है कि बड़ी संख्या में लोग जानते ही नहीं कि इस साधन का क्या करें! वास्तव में इन साधनों का जितना सदुपयोग होता है, शायद उतना ही आज दुरुपयोग होता है।

खैर, इन सब बातों को छोड़ते हुए, ज़फर साहब की इस गज़ल पर ध्यान देते हैं, जिसमें यह बताया गया है, कि जब इंसान, कहीं भी जब खुद को ठीक से अभिव्यक्त नहीं कर पाता, तब उसकी पीड़ा कैसी होती है। एक-दो शेर जो ज्यादा कठिन थे, वो मैंने छोड़ दिए हैं।

प्रस्तुत है बहादुर शाह ज़फर साहब की ये गज़ल-

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो थी

जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी।

ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्र ओ क़रार

बे-क़रारी तुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो न थी ।

उसकी आँखों ने ख़ुदा जाने किया क्या जादू

कि तबीयत मेरी माइल कभी ऐसी तो न थी।

अब की जो राह-ए-मोहब्बत में उठाई तकलीफ़

सख़्त होती हमें मंज़िल कभी ऐसी तो थी।

निगह-ए-यार को अब क्यूँ है तग़ाफ़ुल दिल

वो तेरे हाल से ग़ाफ़िल कभी ऐसी तो थी

चश्म-ए-क़ातिल मेरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन

जैसी अब हो गई क़ातिल कभी ऐसी तो न थी।

क्या सबब तू जो बिगड़ता है ‘ज़फ़र’ से हर बार

ख़ू तिरी हूर-शमाइल कभी ऐसी तो न थी।

नमस्कार।

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