किसी ज़माने में कविताएं लिखने का बहुत चाव था। उस समय जो कविताएं किसी हद तक ‘परफेक्ट’ लगती थीं उनको मित्रों के बीच, गोष्ठियों में पढ़ देता था। बहुत सी पांडुलिपियां ऐसी होती थीं जिनको लेकर तसल्ली नहीं होती थी।

ऐसी ही कुछ कागज़ पर सुरक्षित कविताएं, जिनको मैंने उस समय फाइनल नहीं माना और बाद में उनको फाइनल रूप देने का समय नहीं मिला, आज की तारीख में सोचता हूँ कि उनको ‘जैसी हैं, जहाँ हैं, वैसी शेयर कर लेता हूँ।

एक कविता आज प्रस्तुत है-

पेड़

पेड़ हमारी आस्थाओं का प्रतिफलन है,

पेड़ बनने के लिए ज़रूरी है

कि पहले हम ऐसा बीज हों-

जिसे धरती स्वीकार करे,

फिर धरती में रचे-बसे

रसों-स्वादों, मूल रसायनों से भी

हमारा तालमेल हो,

तभी हम धरती का सीना चीरकर

अपना नाज़ुक सिर, शान से उठा सकेंगे।

फिर यहाँ की  आब-ओ-हवा, गर्द-ओ-गुबार

धूप और बरसात, जब सहन करेंगे

और दूसरों की इनसे रक्षा करेंगे,

तभी कहला सकेंगे- पेड़,

यह सब यदि संभव नहीं-

तो फिर शान से इंसान बने रहो,

जी भरकर नफरत करो दूसरों से,

और करो ऐसे काम, कि वे भी

आपसे नफरत करें।

कुदरत, सभ्यता, शिष्टता, नागरिकता के

जितने भी मापदंड हैं, नियम हैं

उन्हें शान से तोड़ो,

क्योंकि इंसान होने के लिए

सिर्फ इंसान जैसा दिखना ज़रूरी है।

उसके बाद तो इंसान सबसे ऊपर है,

अपनी पहचान रोज़ तोड़ता है-

फिर भी इंसान ही कहलाता है।

क्या ही अच्छा होता अगर

इंसान का भी, धरती से

ऐसा ही रिश्ता होता-

जैसा पेड़ का होता है।

तब यह दुनिया, बाहर से भी हरी-भरी होती

और भीतर से भी!

नमस्कार।

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