पुरानी कविताओं का यह खजाना भी अब निपटने को है, पुरानी जमा-पूंजी के बल पर कोई कब तक तमाशा जारी रखेगा। इस बहाने ऐसी पुरानी रचनाएं डिजिटल फॉर्म में सुरक्षित हो गईं, जो ऐसे ही कहीं कागजों में लिखी पड़ी थीं।

ये लीजिए प्रस्तुत है आज का गीत-

गीतों के सुमन जहाँ महके थे,

वह ज़मीन-

दूर, बहुत दूर।

अजनबी हवाएं,मौसम आदमखोर,

हर तरफ फिजाओं में जहरीला शोर,

सरसों की महक और

सरकंडी दूरबीन,

दूर, बहुत दूर।

कुछ हुए हवाओं में गुम, कुछ को धरती निगल गई,

जो भी अपने हुए यहाँ, उन पर तलवार चल गई,

दिवराती सांझ और

फगुआती भोर,

दूर, बहुत दूर।

मौसम के साथ-साथ बदले साथी,

दुनिया में सब-सुविधा के बाराती,

दुर्दिन में बंधी रहे-

वह कच्ची डोर,

दूर, बहुत दूर।

गीत पंक्ति जैसी आती मीठी याद,

कडुवे अनुभव भी देते मीठा स्वाद,

चांद हुआ बचपन

आहत मन चकोर

तकता कितनी दूर।

नमस्कार।

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