141. दिल से दिल की बात कही और रो लिए।

आज लता मंगेशकर जी की गाई एक गज़ल याद आ रही है, जिसे राजेंदर कृष्ण जी ने लिखा है और इसके लिए संगीत दिया है, मदन मोहन जी ने।

बड़े सुंदर बोल हैं, दिल को छूने वाले जिनको लता जी की आवाज और मदन मोहन जी के संगीत ने बहुत प्रभावशाली बना दिया है।

कुल मिलाकर बात यही है कि मुहब्बत में कभी ऐसे हालात आ जाते हैं कि सपने, ख्वाहिशें, हसरतें सब लापता हो जाते हैं, प्रेमी (या प्रेमिका) खुद से ही बात करते हुए रह जाते हैं। जो सपने देखे थे वे सब टूट जाते हैं।

सभी को खुशी की तलाश होती है, मुहब्बत में भी खुशी ही पाना चाहते हैं। लेकिन होता यह भी है कि खुशी के स्थान पर दुखों को अंगीकार करना पड़ता है। प्रेम करने वाले का दिल जो फूल की तरह है, वह मुरझा जाता है, और हाँ जब दुखों के बोझ में दबकर वह चुप हो जाता/जाती है, तब लोग कहते हैं, क्या हुआ जी, कुछ बोलिए न!

ये तो मेरा मन हुआ कि कुछ अपने शब्दों में भी कह दूं, लीजिए अब इसको पढ़कर, लता जी की गाई गज़ल के प्रभाव को याद कीजिए-

 

यूँ हसरतों के दाग़, मुहब्बत में धो लिये
खुद दिल से दिल की बात कही, और रो लिये। 

घर से चले थे हम तो, खुशी की तलाश में 
ग़म राह में खड़े थे वही, साथ हो लिये।
खुद दिल से दिल की बात कही, और रो लिये॥

मुरझा चुका है फिर भी ये दिल फूल ही तो है
अब आप की खुशी इसे काँटों में तोलिये
खुद दिल से दिल की बात कही, और रो लिये॥

होंठों को सी चुके तो, ज़माने ने ये कहा 
ये चुप सी क्यों लगी है अजी, कुछ तो बोलिये
खुद दिल से दिल की बात कही, और रो लिये॥

यूँ हसरतों के दाग़, मुहब्बत में धो लिये
खुद दिल से दिल की बात कही, और रो लिये। 

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

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