जीवन में अब तक, बहुत से शहरों और क्षेत्रों में रहने का अवसर मिला, हर स्थान की अपनी विशेषता और कमियां हैं। लेकिन कुछ बातें हैं जो भारत में,  हर जगह समान रूप से होती हैं। जैसे रात में आप उठें और बाथ-रूम जाएं तो आपको कुत्तों के रोने का शोर सुनाई देगा।

यह शोर तब भी हो रहा था जब आप बेड रूम में थे, लेकिन पंखे और ए.सी. के शोर में शायद यह कुक्कुर रुदन की आवाजें दब जाती हैं। अब कुत्तों का स्वभाव और स्थिति ऐसे हैं कि वे रात में खुले में रोते हैं, यह स्थिति भारत में आम है, शायद हर जगह मिल जाएगी।

इस दिशा में कोई गंभीर प्रयास अपने देश में नहीं होता, वरना जरूरी नहीं कि कुत्तों की ज़िंदगी भी इतना अधिक कुत्तों जैसी हो। इसका इलाज, काफी हद तक उनकी संख्या को नियंत्रित करने में है, मुझे याद है कि मैंने कहीं पढ़ा था कि हरियाणा में बहुत सालों से कुत्तों की नसबंदी पर मोटी रकम खर्च की जा रही थी और परिणाम में उनकी संख्या बढ़ती ही जा रही थी, मैंने 6 महीने पहले गुड़गांव छोड़ दिया, वैसे मुझे भरोसा है कि आज भी स्थिति वैसी ही होगी।

कुक्कुर रुदन की बात ऐसे ही ध्यान में आ गई, मैंने काफी पहले आवारा पशुओं की समस्या पर एक ब्लॉग लिखा था, आवारा बंदर, कुत्ते और अन्य मवेशी, इस तरफ ध्यान देना बहुत ज़रूरी है।

असल में, आज मैं उस रुदन की चर्चा करना चाह रहा हूँ, जो दुनिया में लगातार चलता रहता है और किसी का ध्यान उस तरफ नहीं जाता। अब और भूमिका नहीं बांधूंगा और अलग से कोई गंभीर बात भी नहीं करूंगा। फिल्म- नागमणि का गीत, कवि- प्रदीप जी का लिखा और उनके द्वारा ही गाया प्रस्तुत है, जो अत्यंत प्रभावशाली है। इसके संगीतकार हैं- अविनाश व्यास और यह गीत अपनी बात खुद कहने में सक्षम है।

 

पिंजरे के पंछी रे, तेरा दर्द ना जाने कोय 

कह ना सके तू, अपनी कहानी
तेरी भी पंछी, क्या ज़िंदगानी रे
विधि ने तेरी कथा लिखी आँसू में कलम डुबोय 
तेरा दर्द ना जानेे कोय।   

चुपके चुपके, रोने वाले
रखना छुपाके, दिल के छाले रे
ये पत्थर का देश हैं पगले, यहाँ कोई ना तेरा होय
तेरा दर्द ना जानेे कोय। 

बस ऐसे ही कुत्तों के रुदन के बहाने वह रुदन याद आ गया, जो हमारे आसपास लगातार चलता रहता है और हम उससे बेखबर रहना चाहते हैं।

नमस्कार।

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