(पुराने ब्लॉग्स को दोहराने के क्रम में आज प्रस्तुत है कालेज जीवन के कुछ अनुभव, यह आलेख थोड़ा लंबा और गहन है! )

बाबूराम स्कूल में 6 साल रहा और अच्छा खासा जुड़ाव रहा स्कूल से, इसलिए स्कूल के बारे में, वहाँ के शिक्षकों के बारे में भी मैंने कुछ बात की। यहाँ स्पष्ट कह दूं कि कालेज से मेरा कोई जुड़ाव नहीं हो पाया और वहाँ से मैंने कुछ हासिल भी नहीं किया, इसलिए कालेज की नहीं, कालेज के दिनों की बात करूंगा।

जैसा मैंने बताया था, हायर सैकेंडरी परीक्षा मैंने जैसे-तैसे सैकिंड डिवीज़न में पास की थी, शायद यही कारण था कि 12 वीं कक्षा के लिए मैंने गाजियाबाद के महानंद मिशन इंटर कालेज में प्रवेश लिया और वहाँ से इंटर परीक्षा जैसे-तैसे पास की। (उस समय दिल्ली बोर्ड की हायर सैकेंडरी 11 वीं कक्षा तक होती थी अतः यूपी से बीएससी करने के लिए पहले इंटर पास करना ज़रूरी था, क्योंकि वहाँ बीए कोर्स 2 वर्ष का था जबकि दिल्ली में 3 वर्ष का था)।

यहाँ एक विशेष कारण, जो इससे पहले की एक-दो कक्षाओं में भी पूरी तरह लागू था, वह बताना उचित होगा। मेरी आंखें काफी कमज़ोर हो गई थीं और मैं आदतन अंतिम सीट पर बैठता था, वैसे आगे की सीट पर बैठकर भी मैं बोर्ड पर जो कुछ लिखा जा रहा था, वह नहीं पढ़ पाता था, इस प्रकार कक्षा में मुझे सिर्फ ऑडियो ही मिल पाता था, जो पढ़ाई में बराबर चलने के लिए काफी नहीं था। और मैंने घर पर कभी इस बारे में बताया भी नहीं।

इंटर की पढ़ाई की दौरान मुझे टॉयफाइड बुखार हुआ, मैं 2-3 दिन अस्पताल में रहा और वहाँ पर ही नेत्र परीक्षण करके मुझे चश्मा लगाने की सलाह दी गई, और इसके बाद, कई वर्षों के अंतराल के बाद, मैं कक्षा में पूरी तरह उपस्थित रहता था।

खैर इंटर कालेज अलग था, जहाँ से मैंने जैसे-तैसे इंटर परीक्षा पास की और अब मुख्य कालेज में आ गया था, दो वर्ष का बीएससी कोर्स करने के लिए।

लेकिन यह भी बता दूं कि पिताश्री, जिनके कानों में बहुत समय से समस्या थी, अब उनको बहुत कम सुनाई देने लगा था। अब सेल्स के काम में यह तो एकदम नहीं चल सकता कि आप बोलते जाओ और दूसरे की बात ही न सुनो। सो कमाई एकदम बंद हो गई थी, और घर में क्योंकि मैं ही उनके सबसे नज़दीक था, अतः मुझसे कहा जाता था कि अपने बाप से पैसे मांग’!

कभी यह भरोसा नहीं होता था कि मेरी अगले महीने की फीस जमा होगी या नहीं। एक घटना सुना दूं, जो भुलाए नहीं भूलती। मेरे पिता ने बहुत से बड़े व्यापारियों के साथ काम किया था, उनमें से किसी से उन्होंने मेरी फीस के बारे में बात की, उसने कहा कि वह खुद आकर मेरी फीस जमा करेगा। मेरे पिताश्री ने कालेज में इंतज़ार करने के लिए कहा और वो उस व्यापारी को साथ लेकर आ रहे थे। बहुत देर हो गई उनको गाज़ियबाद आने में, कालेज की छुट्टी हो गई और मैं घर वापस आ गया। वह पहला अवसर था जब घर लौटकर मेरे पिता ने मुझे बुरी तरह डांटा था।

खैर मेरे पिता ने हिम्मत नहीं हारी और वे मुझे पहाड़ गंज में किसी व्यापारी के घर ले गए। वह भी कीमत वसूलने में एक्सपर्ट था, उसकी दो बेटियां शायद दसवीं कक्षा में पढ़ती थीं। उसने उस दिन उनको पढ़ाने के लिए कहा और मेरे पिता को फीस के पैसे दे दिए। जब मैं शरमाता हुआ उन लड़कियों को पढ़ा रहा था, तब वे दोनों मेज़ के नीचे मेरे पैर पर पैर मार रही थीं।

उस व्यापारी ने पैसा देते हुए यह शर्त रखी थी कि मैं हर रोज़ पढ़ाने के लिए आऊंगा। मैं यह सोच रहा था कि हर रोज़, शाहदरा से पहाड़ गंज पढ़ाने के लिए कैसे आऊंगा। घर पहुंचकर पिताश्री ने कहा कि कोई ज़रूरत नहीं है वहाँ जाने की, मैं बहुत बिज़नस उसको दे चुका हूँ। अब इस मामले में मैं तो खैर मज़बूर था, इससे पहले कभी मैं अकेला पहाड़गंज गया भी नहीं था।

अब एक वाकया और याद आ गया। इससे पहले पिताश्री ने मुझे शाहदरा में ही, सर्कुलर रोड पर ट्यूशन दिलवाई थी, दो लड़कों को मैं वहाँ पढ़ाता थ, शायद 7-8 कक्षा के थे। ट्यूशन दिलाते समय पिताश्री ने मुझसे कहा था कि मैं उन बच्चों के पिता से ठीक से बात करूं, वकील है वह, कभी काम आ सकता है। खैर इस ट्यूशन के दौरान ही उन सज्जन ने मुझसे कहा- मास्टर जी, कभी हमको भी पढ़ा दीजिए। मैंने कहा क्या बात करते हैं, आप तो वकील हैं! वो बोले आपको गलतफहमी हो गई है जी, मेरा नाम वकील है, मैं तो अंगूठा छाप हूँ। यह गलतफहमी भी पिताश्री को कम सुनाई देने के कारण ही हुई थी।

खैर दो वर्षीय बीएससी पाठ्यक्रम का पहला वर्ष मैंने पूरा कर लिया, काम जैसा भी चल रहा हो, पिताश्री दौरे पर जाते ही रहते थे और यह निश्चित नहीं रहता था कि कब लौटकर आएंगे।

वैसे वो यह भी बताते थे कि वो जैन मुनियों के गुरु बन सकते हैं, इसकी पूरी शिक्षा उन्हें प्राप्त हैं और लोग उनको बुलाते भी रहते हैं।

इस बार जब पिताश्री दौरे पर गए, तो फिर इंतज़ार का समय समाप्त ही नहीं हुआ और धीरे-धीरे उनके लौटने की आशा भी समाप्त हो गई। मुझे विश्वास है कि इसके बाद की उनकी जीवन अवधि अपेक्षाकृत सुखपूर्ण रही होगी।

मैंने बीएससी प्रथम वर्ष की परीक्षा पास की थी और पिताश्री के जाने के बाद आगे पढ़ना संभव नहीं था। मैंने नौकरी शुरू की और फिर बाद में 8 वर्षों के अंतराल के बाद निजी परीक्षार्थी के रूप में बी.ए. और फिर एम.ए. परीक्षाएं पास कीं।   

एक मामले में सामने वाले, मुल्तानी बाबा की ज्योतिष विद्या भी फेल हो गई, उनका कहना था कि मेरे पिता  मुझसे एक बार अवश्य मिलेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

आलेख कुछ लंबा हो गया न! खैर इसके बाद भी मैं अपनी एक कविता अवश्य शेयर करूंगा-

 

पिता के नाम

हे पिता

यदि हो कहीं, तो क्या लिखूं तुमको

बस यही, जो जिस तरह था

उस तरह ही है।

पत्र है अभिवादनों की शृंखला केवल

हम अभी जीवित बचे हैं, यह बताने को,

और आश्वासन इसी अनुरूप पाने को,

मैं न मानूं किंतु प्रचलन

इस तरह ही है।

हाल अपना क्या सुनाऊं, ठीक सा ही है,

गो कि अदना क्लर्क–  

कल का महद आकांक्षी,

ओस में सतरंगदर्शी बावला पंछी

हो गया है, मुदित सपना, आपके मन का

जी रहा है, और जीवन

उस तरह ही है।

साथ हैं अब कुछ वही एहसास सपनीले-

वह फिसलने फर्श पर मेरा रपट जाना,

और चिंता से तुम्हारा आंख भर लाना,

बीच सड़कों, धुएं, ट्रैफिक के गिरा हूँ मैं

और यह ध्यानस्थ दुनिया-

उस तरह ही है।

                                                                                                                                                                 –श्रीकृष्णशर्मा

                ———————-