15. नक्काशी करते हैं नंगे जज़्बातों पर

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लीजिए पुरानी कहानी को और आगे बढ़ाते हैं, प्रस्तुत है अगला पन्ना।

 दिल्ली में उन दिनों तीन-चार ही ठिकाने होते थे मेरे, जिनमें से बेशक उद्योग भवन स्थित मेरा दफ्तर एक है, उसके अलावा शाम के समय दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी या फिर कनॉट प्लेस, जहाँ अनेक साहित्यिक मित्रों से मुलाक़ात होती थी। इसके अलावा जब बुलावा आ जाए तब आकाशवाणी में युववाणी केंद्र, जिसका कार्य उस समय देखती थीं- श्रीमती कमला शास्त्री, युववाणी में अनेक बार मैंने कवि गोष्ठियों या कविताओं की रिकॉर्डिंग के लिए भाग लिया तथा गीतों भरी कहानी, अपनी पसंद के गीतों आदि की भी प्रस्तुति की।

आकाशवाणी की एक घटना मुझे याद आ रही है। श्रीमती कमला शास्त्री को बच्चन जी का इंटरव्यू लेना था। बच्चन जी से तात्पर्य है- श्रेष्ठ कवि श्री हरिवंश राय बच्चन जी। इस साक्षात्कार के लिए श्रीमती कमला शास्त्री के अनुरोध पर मेरे कवि मित्र डा. सुखबीर सिंह जी तथा मैं बच्चन जी को उनके निवास से अपने साथ लाने के लिए गए। डा. सुखबीर सिंह  दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे तथा दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी में शनिवार की साहित्यिक सभा में नियमित रूप से आते थे। बच्चन जी उस समय दिल्ली में श्रीमती गांधी के घर की बगल में रहते थे। हम बच्चन जी को सादर अपने साथ लेकर आए तथा उनके साक्षात्कार के दौरान भी हम स्टूडियो में मौज़ूद थे।

श्रीमती कमला शास्त्री ने बच्चन जी से अनेक प्रश्न पूछे तथा उन्होंने उनके बड़े माकूल उत्तर दिए। एक प्रश्न मुझे अभी तक याद है। श्रीमती शास्त्री ने उनसे पूछा कि आपकी कविताओं के लोकप्रिय होने का कारण क्या यह है कि आपकी भाषा बहुत सरल है? इस पर बच्चन जी ने बड़ा सारगर्भित उत्तर दिया। बच्चन जी ने कहा कि भाषा सरल होना कोई आसान काम नहीं है। अगर आपके व्यक्तित्व में जटिलता है तो आपकी भाषा सरल हो ही नहीं सकती। हमारी भाषा सरल हो इसके हमको निष्कपट होना होगा, हमको बच्चा होना होगा, तभी हमारा मन निर्मल होगा और हमारी भाषा सरल होगी। इसीलिए कहते हैं- ‘लैंग्वेज इज़ द मैन’।

एक ठिकाना और था उन दिनों मेरा। कवि श्री धनंजय सिंह का घर। अपने घर जाने से भी ज्यादा आज़ादी के साथ, उनके घर किसी भी समय जा सकते थे। उनके माध्यम से ही बहुत से कवियों को निकट से जानना अधिक आसान हुआ। ऐसे ही एक कवि थे- श्री कुबेर दत्त, जो उन दिनों संघर्ष कर रहे थे। बाद में वे दूरदर्शन में नियुक्त हुए।  एक बार श्री कुबेर दत्त ने एक प्रमुख दैनिक समाचार पत्र में, मेरे सहित कुछ युवा लोगों के विचारों को शामिल करते हुए एक परिचर्चा प्रकाशित की ‘ज़िंदगी है क़ैद पिंजरों में’। श्री कुबेर दत्त उन दिनों बहुत अच्छे गीत लिखा करते थे। उनका एक गीत जो मुझे बहुत प्रिय है, उसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं-

ऐसी है अगवानी चितकबरे मौसम की

सुबह शाम करते हैं, झूठ को हजम,

सही गलत रिश्तों में, बंधे हुए हम।

 

नक्काशी करते हैं, नंगे जज़्बातों पर

लिखते हैं गीत हम नकली बारातों पर,

बची-खुची खुशफहमी, बाज़ारू लहज़े में,

करते हैं विज्ञापित कदम दर कदम।

सही गलत रिश्तों में, बंधे हुए हम।।

 

पत्रों पर आंक रहे, अनजाने पते नाम,

जेबों में हाथ दिये, ढूंढ रहे काम धाम,

सांसों पर व्यापारी आंतों का कब्ज़ा,

पेट पकड़ छिकने का तारीखी क्रम।

सही गलत रिश्तों में, बंधे हुए हम।।

संघर्ष के दिनों में कुबेर दत्त मेरे हीरो हुआ करते थे। संघर्ष के दिनों में उनके एक और मित्र होते थे- सोमेश्वर। जो शायद कमलेश्वर को अपना आदर्श मानते थे। उनकी एक लंबी कहानी छपी थी सारिका में, जिसका नाम भी काफी लंबा था- ‘चीजें कितनी तेज़ी से बदल जाती हैं’। खैर मैं बता रहा था संघर्ष के दिनों की बात। श्री सोमेश्वर ने बताया कि कुबेर दत्त के साथ बीड़ी पीने के लिए वे कई किलोमीटर साइकिल चलाकर जाते थे। ये भी कि पहले आधी बीड़ी पीकर फेंकते जाते थे, फिर जब खत्म हो जाती थीं तब उनके टुकड़े ढूंढकर पीते थे।

खैर श्री कुबेर दत्त दूरदर्शन में नियुक्त हो गए, ऐसा स्थान जिसके लिए वे सर्वथा उपयुक्त थे, वहाँ वे निदेशक स्तर तक पहुंचे और कुछ बहुत अच्छे कार्यक्रम उन्होंने तैयार किए। लेकिन दूरदर्शन में जाने के बाद कुबेर जी का गीत लिखना छूट गया बल्कि वे कहने लगे कि गीत तो पलायन है।

हाँ दूरदर्शन में जाने के कुछ समय बाद ही उन्होंने एक गीत लिखा था-

उस पुराने चाव का, प्रीति के बहलाव का

दफ्तरों की फाइलें, अनुवाद कर पाती नहीं।  

कुछ और कवि मित्र हैं दिल्ली के, जिनका ज़िक्र आगे करेंगे।

अंत में अपनी कुछ पंक्तियां, जो दिल्ली में यमुना पार निवास के दर्द को भी दर्शाती हैं-

हर एक मुक़ाम पर

ठहरा, झुका, सलाम किया,

वो अपना घर था, जिसे रास्ते में छोड़ दिया।

उधर हैं पार नदी के बहार-ओ-गुल कितने,

इधर हूँ मैं कि ये जीवन

नदी के पार जिया।

नमस्कार।

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