फिलहाल वही काम कर रहा हूँ, जो सबसे आसान है, अपने पुराने ब्लॉग दोहराना, लीजिए प्रस्तुत है एक और ब्लॉग।

 ऐसा लगता है कि कवियों, साहित्यकारों की बात अगर करते रहेंगे तो दिल्ली छोड़कर आगे ही नहीं बढ़ पाएंगे। लेकिन कुछ लोगों की बात तो करनी ही होगी।

आज पहले एक गोष्ठी की बात कर लेते हैं, जो दिल्ली में हिंदी साहित्य सम्मेलन कार्यालय में हुई थी। हिंदी साहित्य सम्मेलन का यह कार्यालय उस समय था, कनॉट प्लेस में उस जगह, जहाँ अभी पालिका बाज़ार है। उस जगह पहले इंडियन कॉफी हाउस हुआ करता था, काफी विस्तृत क्षेत्र में फैला, गोल आकार का था और हमेशा भरा रहता था, शोर वहाँ इतना होता था कि लगता था छत उड़ जाएगी, जो कि कबेलू की बनी थी, दूर से देखें तो बहुत बड़ी झोपड़ी जैसा लगता था यह कॉफी हाउस, जिसमें किसी समय लोहिया जी तथा अन्य बड़े नेता भी आते थे।

कॉफी हाउस के पीछे लंबी सी एक मंज़िला इमारत थी, जिसमें एक कमरे में हिंदी साहित्य सम्मेलन का कार्यालय भी था, कभी गोपाल प्रसाद व्यास जी इसके कर्ता-धर्ता हुआ करते थे। वहाँ नियमित रूप से साहित्यिक बैठकें हुआ करती थीं। इनमें से एक विशेष बैठक की ही मैं बात कर रहा हूँ, इस बैठक की विशेषता थी कि इसमें अज्ञेय जी शामिल थे। जैसा कि सामान्यतः होता है, बैठक में उपस्थित कवियों/साहित्यकारों में शिक्षकों, प्रोफेसरों की भरमार थी।

इस बैठक में अपने विचार व्यक्त करते हुए अज्ञेय जी ने कहा कि अध्यापक वर्ग के लोग क्योंकि कविता और साहित्य से संबंधित रहते हैं, इनसे जुड़े हुए सिद्धांतों को पढ़ाते, दोहराते हैं अतः यह तो होता है कि इनमें से अधिकाधिक लोग साहित्य में हाथ आज़माते हैं, लेकिन उन्होंने अपना विचार व्यक्त किया कि इनके माध्यम से मौलिक सृजन की संभावना काफी कम रहती है।

अब यह तो बहुत बड़े संकट की बात थी अज्ञेय जी के लिए कि प्रोफेसरों की मंडली में बैठकर उन्होंने कह दिया कि आप लोगों के मौलिक लेखक होने की संभावना बहुत कम है। अब कौन है जो लिखता है और मान लेगा कि मेरा लेखन मौलिक नहीं है। खास तौर पर ऐसे माहौल में जहाँ आप मान रहे हों कि नारे लगाना भी मौलिक लेखन है। इसके बाद जो हुआ होगा इसकी कल्पना आप स्वयं कर सकते हैं।

अज्ञेय जी का योगदान भारतीय साहित्यिक परिदृश्य में अप्रतिम है, उनका उपन्यास ‘शेखर एक जीवनी’ और नई कविता के क्षेत्र में, प्रतिनिधि कवियों के तीन संकलन ही अपने आप में उनकी बहुत बड़ी देन हैं। यहाँ उनकी केवल एक पंक्ति दे रहा हूँ-

पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ।
उसी के लिए स्वर-तार चुनता हूँ।

अब मैं, काव्य मंचों के एक ऐसे कवि का उल्लेख करना चाहूंगा जिन्होंने मुझे अत्यंत प्रभावित एवं प्रेरित किया है। ये हैं मेरठ के गीतकार श्री भारत भूषण जी, इस नाम के एक नई कविता के कवि भी रहे हैं, इसलिए मैंने मेरठ का ज़िक्र किया। भारत भूषण जी की कुछ पंक्तियों का उल्लेख यहाँ अवश्य करना चाहूंगा।

चक्की पर गेंहू लिए खड़ा, मैं सोच रहा उखड़ा-उखड़ा

क्यों दो पाटों वाली चाकी, बाबा कबीर को रुला गई।

गीतों की जन्म- कुंडली में संभावित थी यह अनहोनी,

मोमिया मूर्ति को पैदल ही मरुथल की दोपहरी ढोनी,

खंडित भी जाना पड़ा वहाँ ज़िंदगी जहाँ भी बुला गई।।  

 

लेखनी मिली थी गीतव्रता, प्रार्थना पत्र लिखती बीती,

जर्जर उदासियों के कपड़े, थक गई हंसी सीती-सीती

हर भोर किरण पल भर बहला, काले कंबल में सुला गई॥   

 

एक और गीत की कुछ पंक्तियां, किस प्रकार इंसान अपने बुरे समय के लिए अपने पूर्व कर्मों को दोष देता है और कवि की निगाह में सबसे बड़े पाप क्या हैं-

तू मन अनमना न कर अपना, इसमें कुछ दोष नहीं तेरा

धरती के कागज़ पर मेरी तस्वीर अधूरी रहनी थी।

 

मैंने शायद गत जन्मों में, अधबने नीड़ तोड़े होंगे,

चातक का स्वर सुनने वाले, बादल वापस मोड़े होंगे,

ऐसा अपराध किया होगा, जिसकी कुछ क्षमा नहीं होती,

तितली के पर नोचे होंगे, हिरणों के दृग  फोड़े होंगे,

मुझको आजन्म भटकना था, मन में कस्तूरी रहनी थी।

कविकर्म के संबंध में भी एक मार्मिक गीत है उनका-

आधी उमर करके धुआं

ये तो कहो, किसके हुए,

परिवार के या प्यार के,

या गीत के, या देश के ।

अब अगर कवियों, साहित्यकारों की बात ही करता रहूंगा तो कहानी आगे नहीं बढ़ पाएगी। बस एक ब्लॉग और उसके बाद कहानी को आगे बढ़ाऊंगा।

नमस्कार

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