157. या रब न वो समझे हैं, न समझेंगे मेरी बात!

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सामान्यतः मैं अपने ब्लॉग्स में गीतों, गज़लों के माध्यम से अपनी बात कहने की कोशिश करता हूँ। कई बार मन होता है कि किसी सामयिक विषय पर अलग से अपनी बात कहूं। ऐसा मैं कभी-कभी करता भी हूँ, जब ऐसी घटना हो जो सामाजिक विसंगति अथवा उपलब्धि से जुड़ी हो लेकिन जिसे किसी राजनैतिक गतिविधि से न जोड़ा जा सके। वैसे आजकल ऐसा माहौल बन गया है कि कौन सी घटना है, जिसे राजनीति से नहीं जोड़ा जा सकता! और उसके बाद भक्त, विभक्त और अभिशप्त लोग हाथों  में पत्थर, पोस्टर और मुंह में गालियां भरकर निकल पड़ते  हैं अभियान पर।

वैसे राजनीति  भी आज, नेहरू-पटेल से शुरू होकर मणि शंकर ऐयर,  केजरीवाल और जिग्नेश मेवाणी के स्तर तक आ गई है, यह निश्चित रूप से बहुत बड़ी गिरावट है। जिग्नेश मेवाणी जैसी भाषा बोलते हैं, वह निश्चित रूप से अत्यंत निम्न स्तर की है। केजरीवाल एक पढ़े-लिखे, ईमानदार, भ्रष्टाचार विरोधी नेता के रूप  में सामने आए थे और उनकी  ईमानदारी पर मैं कोई सवाल भी नहीं उठा रहा हूँ। मुझे इतनी जानकारी भी नहीं है, परंतु सार्वजनिक जीवन में भाषा की मर्यादा भी बहुत ज़रूरी है।भाषा की मर्यादा लांघने वाले, दोनो पक्षों में बहुत से लोग हैं, लेकिन रिकॉर्ड निश्चित रूप से इन महानुभावों ने ही बनाया है।

मुझे अभी तक याद है जब केजरीवाल जी की पहली सरकार गिरी थी, उस समय उन्होंने विधान सभा में उस सत्र का अंतिम भाषण दिया था। उनके एक-एक शब्द से शालीनता और विनम्रता टपकती थी। फिर नई सरकार बनने के बाद केजरीवाल जी  ने देश के प्रधान मंत्री के बारे में कई बार जिस भाषा का प्रयोग किया, वो किसी भी रूप में किसी सभ्य  व्यक्ति अथवा राजनेता की भाषा नहीं है। लेकिन राजनीति का विभाजन इतना ज़बर्दस्त है कि उनके विरोधी तो इसके लिए उनकी तुरंत बुराई कर देंगे, परंतु किसी भक्त को ऐसा लगेगा ही नहीं कि उन्होंने कोई गलती की है।

ऐसे ही आज राजनीति में शालीनता के इस घटते स्तर पर ध्यान गया तो यह बात कह दी। खैर छोड़िए राजनीति को,  मुनव्वर राना साह्ब की एक गज़ल शेयर कर रहा हूँ, इसका आनंद लीजिए-

तुम्हारे जिस्म की ख़ुशबू गुलों से आती है

तुम्हारे जिस्म की ख़ुशबू गुलों से आती है
ख़बर तुम्हारी भी अब दूसरों से आती है।

हमीं अकेले नहीं जागते हैं रातों में
उसे भी नींद बड़ी मुश्किलों से आती है।

हमारी आँखों को मैला तो कर दिया है मगर
मोहब्बतों में चमक आँसुओं से आती है।

इसीलिए तो अँधेरे हसीन लगते हैं
कि रात मिल के तेरे गेसुओं से आती है।

ये किस मक़ाम पे पहुँचा दिया मोहब्बत ने
कि तेरी याद भी अब कोशिशों से आती है।

                                                                    ( मुनव्वर राना) 

नमस्कार। 

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