जीवन यात्रा का एक और पड़ाव और, एक और पुराना ब्लॉग!

हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड का मऊभंडार में कारखाना था, जहाँ मेरा साक्षात्कार एवं चयन हुआ था, बड़े अधिकारी यहाँ बैठते थे। हमारे वरिष्ठ प्रबंधक- राजभाषा श्री गुप्ता जी भी यहाँ बैठते थे, वैसे वो अपना उपनाम ‘गुप्त’ ही लिखते थे और कहते थे कि गुप्ता का अर्थ कुछ गलत होता है। उनके अलावा एक हिंदी अधिकारी भी थे- श्री हरिनंदन प्रसाद ‘प्रभात’।  वे हिंदी अधिकारी के अलावा वैद्य भी थे।

मेरी पोस्टिंग मुसाबनी माइन्स में हुई थी, जो कारखाने से 8 कि.मी. दूर थी। यहाँ पर मेरे बॉस थे- मुख्य कार्मिक प्रबंधक- श्री किरण कुमार जगाती, इनका इलाहाबाद में ‘जगाती होटल’ भी था किसी समय। श्री जगाती उत्तराखंड से थे, उस समय तक पता नहीं उत्तराखंड बना था या नहीं, परंतु जब भी श्री के.सी.पंत या श्री नारायण दत्त तिवारी कोई पद ग्रहण करते तब वे उनको बधाई संदेश अवश्य भेजते थे, मुझे मालूम है क्योंकि पत्र का मसौदा मैं ही तैयार करता था। बहुत अच्छे इंसान थे जगाती जी लेकिन अक्सर टेंशन में रहते थे। दफ्तर में आते समय यदि सफाई कर्मी अपने डब्बे के साथ सामने पड़ गया तो उसकी खैर नहीं होती थी।

अब थोड़ी बात स्थान की कर लें। मऊभंडार घाटशिला स्टेशन से लगभग 2 कि.मी. दूर था। घाटशिला बंगला के ख्यातिप्राप्त रचनाकार- श्री विभूति भूषण बंद्योपाध्याय की कर्मस्थली है, जो रांची से कोलकाता की यात्रा में मध्य बिंदु है। विभूति दा के किसी भी उपन्यास में भूमिका के बाद, नीचे लिखा मिलेगा- घाटशिला और तारीख। विभूति दा के उपन्यासों पर सत्यजीत राय ने पथेर पांचाली तथा अन्य अनेक फिल्में बनाई हैं। हिंदी फिल्म ‘सत्यकाम’ भी उनके उपन्यास पर आधारित है और इसकी शूटिंग भी वहीं पर हुई थी।

विभूति दा के जन्मदिन समारोह में वहाँ प्रतिवर्ष बिहार, बंगाल और उड़ीसा के मुख्यमंत्री अथवा वरिष्ठ मंत्री आते थे, अब तो एक और राज्य बढ़ गया है क्योंकि अब यह इलाका ‘झारखंड’ में आता है।

खैर अब दफ्तर पर आते हैं, जैसा मैंने कहा घाटशिला स्टेशन से 2 कि.मी. दूर है मऊभंडार कारखाना, जहाँ खदानों से प्राप्त ताम्र अयस्क को प्रोसेस करके उससे तांबा बनाया जाता है। फिर मऊभंडार कारखाने से 8 कि.मी. और आगे जाना होता है, तब मुसाबनी माइन्स आती हैं। जैसा मैंने बताया मेरी पोस्टिंग माइन्स में थी, माइन्स और कारखाने के बीच अधिकारियों के आने-जाने के लिए शटल बस चलती थी। इत्तफाक से मेरी अनुवाद क्षमता से उच्च अधिकारी कुछ ऐसा प्रभावित हुए थे कि मुझे बार-बार कारखाने जाना पड़ता था, क्योंकि वहाँ ई.डी. बैठते थे अतः उसे ई.डी. ऑफिस कहा जाता था और मुझे वहाँ के काम के लिए ही बुलाया जाता था। अक्सर ऐसा होता था कि वहाँ के वरि. प्रबंधक (जन संपर्क)- श्री राजेंद्र कुमार ‘राज’ मुझे गेस्ट हाउस में बिठा देते थे, बोलते थे जो खाना-पीना हो, खाते-पीते रहो और अनुवाद या प्रचार सामग्री लिखने का काम करते रहो।

शुरू में तो बड़ी दिक्कत हुई, एक अनुवाद जो प्रभात जी (हिंदी अधिकारी) कर चुके थे, वह मुझे सुधारने के लिए उच्च अधिकारियों ने दे दिया, किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति द्वारा लिखा गया लेख था। वैसे बहुत भ्रष्ट अनुवाद था और मुझे मालूम भी नहीं था कि किसने किया है। जब मैंने सुधार कर दिया तब प्रभातजी ने मुझसे कहा- आपकी हिम्मत कैसे हुई मेरे अनुवाद में सुधार करने की। खैर अधिक विवरण देकर आपको ‘बोर’ नहीं करूंगा।

कुल साढ़े तीन साल बिताए मैंने वहाँ प्रकृति की गोद में, एकदम जंगल में मंगल का माहौल होता है परियोजना की टाउनशिप में, देश के हर कोने के लोग थे वहाँ, वैसे बंगाल और उड़ीसा के लोग कुछ ज्यादा थे, जितने वहाँ अधिकारी थे, लगभग उतने ही ‘अधिकारी’ उपनाम वाले लोग थे।

एक अधिकारी थे वहाँ सिंह साहब, वो घर से बड़ी सी गाड़ी में निकलते थे, कुछ दूर निकलने पर ही उसका पेट्रोल खत्म हो जाता था, बाकी रास्ता वह धक्के से ही पूरा करती थी। कुछ समय में लोग यह बात समझ गए थे और जब वे गाड़ी लेकर निकलते तो लोग उस रास्ते से दूर रहने में ही अपनी भलाई समझते थे।

वहाँ के अधिकांश कर्मचारी ऐसे थे कि यदि किसी अधिकारी ने बुलाया है तो वे जूते बाहर उतारकर आते थे। उनसे  बैठने को कहो तो वे नीचे बैठ जाएंगे, कुर्सी पर नहीं बैठेंगे।

वहाँ एक कॉपर क्लब था जिसमें हर सप्ताह प्रसिद्ध विदेशी फिल्में दिखाई जाती थीं। विशेष बात ये कि वे सेंसर्ड नहीं होती थीं। जैसे एक बार मैं वहाँ गया और मैंने पूछा कि फिल्म चालू हो गई क्या तो जवाब मिला कि जल्दी जाओ, दो-तीन सीन निकल चुके हैं।

खैर अपने बॉस श्री जगाती की बात कर लेता हूँ, ऊपर वाले की दया से वे मुझे बहुत पसंद करते थे। उनके पास एक डॉगी भी था, मतलब कुक्कुर! उन डॉगी महोदय को पॉटी वॉक कराने के लिए हमारे यहाँ के दो-तीन कार्मिक अधिकारियों में तगड़ा कम्पिटीशन रहता था।

आगे कुछ और बातें करेंगे, अभी अपना एक गीत शेयर कर लेता हूँ-

एक्लव्य हम

मौसम के फूहड़ आचरणों पर व्यंग्य बाण,

साधे पूरे दम से, खुद को करके कमान,

छूछी प्रतिमाओं को दक्षिणा चढ़ानी थी,

यह हमसे कब हुआ।

 

कूटनीति के हमने, पहने ही नहीं वस्त्र,

बालक सी निष्ठा से लिख दिए विरोध-पत्र,

बैरी अंधियारे से कॉपी जंचवानी थी,

यह हमसे कब हुआ।

 

सुविधा की होड़ और विद्रोही मुद्राएं,

खुद से कतराने की रेशमी विवशताएं,

खुले हाथ-पांवों में बेड़ियां जतानी थीं,

यह हमसे कब हुआ।

                                                         –श्रीकृष्ण शर्मा

नमस्कार।

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