23. चांद पागल है अंधेरे में निकल पड़ता है!

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जीवन यात्रा का एक और पड़ाव और, एक और पुराना ब्लॉग!
मुसाबनी प्रवास के दौरान मेरे 2-3 पड़ौसियों की बात कर लेते हैं, एक पांडे जी थे, बनारस के और सिविल विभाग में काम करते थे, उनके साथ मिलकर मैं खैनी खाया करता था। एक और पांडे जी थे, वो रांची के थे, दाढ़ी रखते थे और खदान में काम करते थे। एक मिश्रा जी थे, उड़ीसा के थे। मिश्रा जी बड़े सॉफिस्टिकेटिड थे। अपने स्कूटर को बहुत संभालकर रखते थे। अगर कोई उनको बता दे कि स्कूटर की आवाज़ कुछ अलग सी आ रही है तो वे तुरंत स्कूटर को 10-12 कि.मी. दूर सर्विसिंग के लिए ले जाने को तैयार हो जाते थे,क्योंकि आसपास तो कोई सर्विस सेंटर था ही नहीं।
मिश्रा जी का नाम मुझे एक विशेष कारण से याद आ रहा है, एक बार उन्होंने मेरे बारे में एक रोचक टिप्पणी की थी। यह तो मैंने बताया ही है कि वहाँ नेपाली काफी संख्या में थे। मिश्रा जी ने किसी से मेरे बारे में कहा कि उनका खयाल था कि मैं क्योंकि हिंदी अधिकारी हूँ, मुझे विद्वान और कल्चर्ड होना चाहिए लेकिन उन्होंने पाया कि ‘आय एम नो बेटर देन ए नेपाली’। ‘कैसे’? पूछने पर उन्होंने कहा कि देखो कैसे हा-हा करके हंसता है। तब से उनके सॉफिस्टिकेशन के प्रति मेरा ‘सम्मान’ और अधिक बढ़ गया।
खदान में कई बार दुर्घटना भी हो जाती थी, एक बार दाढ़ी वाले पांडे जी ( हम ऐसे ही याद रखते थे उनको) खदान में फंस गए थे और उनकी मृत्यु की खबर भी फैल गई थी लेकिन भगवान की दया से वे सुरक्षित निकल आए थे। खदान में दुर्घटना का खतरा तो कई बार पैदा हो जाता था, कभी-कभी ऐसा टार्गेट से आगे बढ़कर निष्पादन करने के अति उत्साह में भी होता था। एक बार तो ऐसा भी हुआ कि एक खनिक को घायल अवस्था में खदान से निकाला गया, वह अस्पताल में था तभी छत का कुछ हिस्सा गिर गया, उसने किसी तरह बिस्तर से लुढ़क कर अपनी जान बचाई।
मुसाबनी माइन्स में रहते हुए ही मैंने पहली बार ‘हिंदी शिक्षण योजना’ के अंतर्गत कर्मचारियों को प्रबोध, प्रवीण एवं प्राज्ञ परीक्षाओं के लिए प्रशिक्षित करना प्रारंभ किया। जैसा मैंने बताया, वहाँ सभी इलाकों के लोग थे परंतु बंगाल और उड़ीसा के अधिक ही थे। इस योजना का लाभ बड़े स्तर के अधिकारी भी उठाना चाहते थे, बड़ी संख्या में वहाँ से परीक्षाओं में भाग लेते थे और मैं जो कि एक कनिष्ठतम स्तर का अधिकारी था, उन सभी उच्च अधिकारियों का गुरुजी बन गया था।
एक बात और, मेरे तीन पुत्र हैं, पहला दिल्ली में हुआ था, दूसरा जयपुर में और तीसरे के जन्म-राज्य का मामला विवादास्पद है, क्योंकि उस समय यह बिहार था और अब झारखंड है।
खैर यह भी बता दूं कि धोखाधड़ी करने वाले हर काल में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते रहे हैं। इसका एक उदाहरण याद आ रहा है। हम एक बार वहाँ से टाटानगर गए, वहाँ हम एक दुकान में घुसे तो एक नवयुवक ने हमारा स्वागत किया और अगवानी करके दुकान के अंदर ले गया। हम वस्तुएं पसंद करते गए और वह अन्य लोगों से वह सामान निकालकर देने के लिए कहता रहा। शायद हमने 4-5 हजार का सामान खरीदा था, अंत मे उसने बिल लाकर हमसे पैसे मांगे, जो हमने उसको दे दिए। इसके बाद जब हम सामान के साथ दरवाजे से बाहर निकलने लगे, तब बगल में काउंटर पर बैठे दुकान मालिक ने कहा कि पैसे तो दीजिए।
तब मालूम हुआ कि उस युवक को हम दुकानदार का आदमी मान रहे थे और वे लोग मान रहे थे कि वह हमारे साथ है तथा वह पैसा लेकर गायब हो चुका। अब आगे जो भी हुआ हो, किस्सा तो मजेदार है न, कम से कम आज की तारीख में तो है, उस समय जैसा भी रहा हो।
उड़ीसा में समुद्रतट का इलाका है दीघा, वहाँ से पास पड़ता था और वहाँ जाना एक अनूठा अनुभव था। वहाँ क्योंकि मुंबई जैसी भीड़ नहीं रहती। रात में काफी देर तक हम समुद्र तट पर रहे, बनारस वाले पांडे जी का और हमारा परिवार साथ था। संभव है कि पूर्णिमा का समय रहा हो, लेकिन पानी की जैसी ऊंची दिव्य दीवार मैंने वहाँ बनते देखी, वैसी फिर कभी देखने को नहीं मिली।
अब मेरा क्या है, मैं तो सुनाता जाऊंगा, पढ़ने का कष्ट तो दूसरों को करना है ना!
खैर मैंने शुरू में गुप्ता जी की तारीफ की थे, वास्तव अगर वे न अड़े होते तो वह मिनिस्टर का कैंडिडेट चुन लिया गया होता। लेकिन अब ऐसा हुआ कि मेरे कारण गुप्ताजी को डांट खानी पड़ गई।
असल में कंपनी के खेतड़ी कॉपर कॉम्प्लेक्स में हिंदी अधिकारी की रिक्ति हुई और क्योंकि मेरी मां दिल्ली में थीं और खेतड़ी राजस्थान में, दिल्ली से काफी पास है, अतः मैंने वहाँ जाने के लिए आवेदन किया। जगाती जी  ने मेरा आवेदन आगे बढ़ा दिया और यह उप महाप्रबंधक के पास होते हुए, गुप्ताजी के पास, उनकी टिप्पणी के लिए गया। गुप्ताजी भी दिल्ली के पास, शायद आगरा के रहने वाले थे और इधर आने का मन उनका भी था, इसलिए वे मेरे आवेदन को दबाकर बैठ गए।
श्री जगाती को जब यह पता चला तो उन्होंने गुप्ताजी को फोन पर डांटते हुए कहा कि अगर आप शर्मा को अभी नहीं जाने दोगे तो मैं गारंटी देता हूँ कि मैं ज़िंदगी भर आपको यहाँ से नहीं जाने दूंगा। घबराकर गुप्ताजी ने तुरंत मेरा आवेदन आगे बढ़ा दिया। इस प्रकार मेरे खेतड़ी, राजस्थान जाने की तैयारी हुई।
अब ऐसे ही राहत इंदौरी जी का एक शेर याद आ रहा है-

रोज तारों की नुमाइश में खलल पड़ता है,
चांद पागल है, अंधेरे में निकल पड़ता है।

नमस्कार ।

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