फिटनेस मेंटेन करने के लिए एक बहुत प्रभावी यंत्र बनाया गया, जो आजकल लोग ‘जिम’ में या कुछ संपन्न लोग अपने घरों में भी इस्तेमाल करते हैं। इस यंत्र में जिस पट्टे पर आप चल रहे हैं, वह पीछे खिसकता जाता है, जैसे आपके पांवों के नीचे से जमीन खिसकती जा रही हो और आप पूरी ताकत के साथ इस प्रकार कदम आगे बढ़ाते हैं कि आप अपनी वर्तमान स्थिति में बने रहते हैं। इस तरह आप सेहत तो बना सकते हैं, परंतु आप वास्तव में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ते हैं।

राजभाषा कार्यान्वयन के लिए जो तंत्र, जो व्यवस्था, जो प्राक्रिया तैयार की गई है, वह वास्तव में एक विशाल, अनेक सरकाऊ पट्टों वाला ट्रैडमिल ही है। इसके अंतर्गत हिंदी अधिकारी और उनके उच्चतर अधिकारी लोग अपनी सेहत बना सकते हैं। रिपोर्टें एक स्तर से दूसरे पर भेजना, अपनी कल्पना शक्ति और झूठ बोलने की क्षमता का भरपूर प्रदर्शन कर सकते हैं, क्योंकि इस क्षेत्र में सच बोलने की तो इजाजत ही नहीं है।

मैंने अपने सेवाकाल का अधिकांश समय, लगभग 30 वर्ष, राजभाषा कार्यान्वयन की इस कदम-ताल में बिताया, जो 1980 में आकाशवाणी, जयपुर में हिंदी अनुवादक के रूप में कार्य प्रारंभ करने से 2010 में एनटीपीसी से ई-6 स्तर पर सेवानिवृत्ति तक चला।

कुल मिलाकर देखा जाए तो राजभाषा हिंदी की कहानी बहुत उलझी हुई है। जब संविधान बना था, तब इस बारे में, किसी को कोई संदेह नहीं था कि हिंदी को राजभाषा बनना है और इसकी तैयारी के लिए 15 वर्ष की अवधि रखी गई थी।

लेकिन अपनी सरकारें तो वोट से चलती हैं, और वोट दिलाने वाले मुद्दे दिल्ली में अलग हैं और चेन्नई अथवा कलकत्ता में अलग! ऐसा नहीं भी हो तो नेता लोग जनता के मन में डर बैठा देते हैं, जिससे उनकी वोट पक्की हो सके।

सिर्फ हिंदी का ही ऐसा मामला नहीं है, ऐसे कई विषय हैं जिन पर एक निश्चित अवधि के बाद फैसला लिया जाना था, जिनमें आरक्षण भी एक है, लेकिन ये ससुरा वोट ऐसी चीज है कि नेताओं को कुछ करने ही नहीं देता।

अब होता क्या है, नेताओं की कुछ मंडलियां, समितियां निरीक्षण के लिए किसी पांच सितारा होटल में जाकर रुकती हैं, वहाँ ऑफिस में किए गए काम का जो रिकॉर्ड उनको दिखाया जाता है, उसको ही वे सही मान लेते हैं, और होता यह है कि जहाँ कुछ काम नहीं होता उस कार्यालय को शाबाशी मिल जाती है और जहाँ काम तो होता है लेकिन झूठ नहीं बोला जाता उनको फटकार मिलती है।

कहने को बातें बहुत सारी हैं, लेकिन फायदा क्या, ऐसे में नौकरशाही अपनी खूब मर्जी भी चलाती है। जैसे पुस्तकालयों के लिए हिंदी की पुस्तकें पर्याप्त मात्रा खरीदी जाएं ऐसा आदेश दिया जाना तो ठीक है, परंतु जब मैं सेवा में था तब राजभाषा विभाग के किसी उच्च अधिकारी की ओर से आदेश दिया गया कि उनके विभाग द्वारा जारी की गई सूची के आधार पर ही किताबें खरीदी जाएं, शायद ऐसा अभी भी होता है।

मैं यह तो मान सकता हूँ कि राजभाषा कार्यान्वयन के लिए जो तंत्र बना है, उसके अंतर्गत कितनी मात्रा में क्या हो, पुस्तकें खरीदी जाएं, यह फैसला करने का अधिकार तो इन अधिकारियों को हो सकता है, लेकिन कौन सी पुस्तकें? ये तो साहित्य के मामले में भी कोटा/परमिट सिस्टम लागू करने जैसा हो गया। नौकरशाह यह फैसला कैसे कर सकते हैं कि किस साहित्यकार को प्रकाश में आने दिया जाए और किसको नहीं! मैंने इस विषय में लिखा भी था, लेकिन नौकरशाही में कौन इसकी परवाह करता है!
यह विषय इतना व्यापक है कि इसके किस पक्ष पर चर्चा करें और किसको छोड़ दें समझ में नहीं आता।
आखिर में यही कह सकते हैं- ‘राम करेंगे पार बेड़ा हिंदी का’!

नमस्कार।