36. थोड़ी बहुत तो ज़ेहन में नाराज़गी रहे!

Posted by

जीवन यात्रा का एक और पड़ाव, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग!
पश्चिमी क्षेत्र मुख्यालय, मुंबई से स्थानांतरित होकर मैंने जनवरी,2001 में उत्तरी क्षेत्र मुख्यालय,लखनऊ में कार्यग्रहण किया, पिकप भवन, गोमती नगर में कार्यालय था और गोमती नगर में सहारा सिटी के पास ही गेस्ट हाउस था, जहाँ मैं लखनऊ पहुंचने पर रुका था।
यहाँ पर कार्यपालक निदेशक थे- + + ++, जिनकी छवि मेरे मस्तिष्क में महात्मा वाली थी। विंध्यनगर में मैं उनके साथ काम कर चुका था। वे भी उस समय तक गेस्ट हाउस में ही रुके थे और शाम के समय वे टहलते हुए मिल गए।
मेरे नमस्कार करने पर वे बोले- ‘मुंबई से क्यों भाग आए?’ यह सवाल मुझे बहुत जोर से झटका देने वाला लगा, खास तौर पर उसके मुख से, जिसकी छवि मेरे मन में महात्मा वाली थी। खैर कुछ समय में ही मुझे मालूम हो गया कि वे भाषण देते समय तो अब भी महात्मा ही होते थे, परंतु व्यवहार के मामले में, वे महात्मा छोड़कर कुछ भी हो सकते थे।
लखनऊ में भी बहुत अच्छे मित्र मिले, दिक्कत यही है कि अच्छे लोगों का ज्यादा ज़िक्र नहीं होता, भले ही वे कितनी भी बड़ी संख्या में हों। छोटे- बड़े, सभी प्रकार के पदों पर बहुत सज्जन लोग मिले, लेकिन फिर भी बड़े पदों पर बैठे कुछ छोटे लोगों का ज़िक्र ज्यादा लंबा हो जाता है, ये मेरा कुसूर नहीं है, बाबा तुलसीदास जी ने भी सबसे पहले खल-वंदना की है, क्योंकि वे बिना बात दायें-बायें होते रहते हैं। कहानी तो तभी बनती है न!
लखनऊ में जाकर पहली बार यह खयाल गंभीरता के साथ आया कि अपना मकान होना चाहिए, वैसे ये खयाल मेरे मन में कभी नहीं आया, मेरी पत्नी के मन में आया और पत्नी और बच्चों ने मिलकर मकान खोजा एक मंज़िल वाला, उसे खरीदा गया और फिर बड़ी हसरतों से उसको ऊपर की ओर बढ़ाया गया, मतलब दो मंज़िला।
अब दफ्तर में क्या है, जो काम है वो करना है वह होता जाता है, अगर कुछ दुष्ट लोग न हों तो कैसे कहानी सुनाएगा कोई। अब यह भी जान लीजिए कि मेरी कहानी में कोई दुष्ट प्राणी था, वो ऊपर भी चला गया मान लो, तब उसकी कहानी कहने से क्या फायदा?
असल में किसी की बुराई करना मेरा उद्देश्य नहीं है। आज और इसके बाद, कोई ऐसा प्राणी अपनी मनमानी न कर पाए, उसको समय पर माकूल जवाब मिल जाए तो कुछ शरीफ लोग बिना बात कष्ट झेलने से बच जाएंगे।
एक दो किस्से, महात्मा + + ++ जी के बता देता हूँ। ये मान्यवर पश्चिमी क्षेत्र मुख्यालय के प्रधान थे, दो-तीन ड्राइवर थे मुख्यालय में, जिन्हें कायदे से अन्य लोगों की भी सेवा करनी चाहिए थी, लेकिन वे इनके लिए ही कम पड़ते थे। एक गाड़ी तो इनके यहाँ दो शिफ्ट में चलती थी, मतलब दो ड्राइवर उसमें लगते थे।
श्रीमान जी के पास एक ड्राइवर सुबह 4 बजे पहुंच जाता था, वे उठते 5 बजे तक, गाड़ी में 3-4 किलोमीटर दूर एक पार्क तक जाते, वहाँ गाड़ी से उतरकर दो-चार चक्कर लगाते, फिर वापस घर आते। इस प्रकार उस गरीब की ड्यूटी सुबह 4 बजे से प्रारंभ हो जाती थी।
एक गाड़ी मुख्यतः उनकी एक बेटी की सेवा में रहती थी अधिकतम समय, कभी उनकी मां भी साथ चली जाती थी। कभी बेटी किसी से नाराज़ हो गई तो ऑफिस में फोन करती, पापा उसका ट्रांसफर कर दो, उसने मेरा कहना नहीं माना।
अब लगे हाथ उनकी पत्नी की भी तारीफ कर दें, देहाती महिला थीं लेकिन काम लेने में माहिर थीं। उनके बंगले पर कंपनी की तरफ से एजेंसी का एक चौकीदार रहता था। घनघोर सर्दियों में, जब वह चौकीदार सामने बने छ्ज्जे के नीचे बैठकर ड्यूटी कर रहा था तब यह भद्र महिला बोली कि मेन गेट के पास खुले में बैठो और डंडा बजाते रहो, जिससे मालूम हो कि जाग रहे हो।
वह चौकीदार मुझसे बोला कि अगर यह बुढ़िया एक दिन इस तरह ड्यूटी कर ले तो मैं अपनी पूरी तनख्वाह दे दूंगा।
कितनी कहानी सुनाएं! एक बात और, हमारे मानव संसाधन के बॉस ने ही उनको एक गलत आदत डाल दी थी। वे सप्ताह में एक बार तो दिल्ली स्थित केंद्रीय कार्यालय जाते ही थे। हर बार जाते और वापस आते समय, एक अधिकारी की ड्यूटी लगती थी उनके साथ एयरपोर्ट जाने या वहाँ से उनको लेकर आने के लिए। कुछ लोग तो खैर ऐसे कामों के लिए ही बने होते हैं। एक बार कोई गए और उनकी फ्लाइट मिस हो गई, अब उन्होंने उस अधिकारी को मनहूस की श्रेणी में डाल दिया।
एक बार मेरी भी ड्यूटी लगा दी गई। मैं उनके साथ जाने के लिए, उनके ड्राइंग रूम के एक किनारे पर गेस्ट एरिया में था और उनकी पत्नी काफी दूर किचेन के बाहर, मैंने काफी देर तक देखा कि वे मेरी तरफ मुड़कर देखें तो मैं नमस्कार करूं। लेकिन उन्होंने मेरी तरफ नहीं देखा और मैं नमस्कार नहीं कर पाया। वैसे जिस तरह के लोग उनको प्रिय हैं वे तो अंदर घुसकर चरण-स्पर्श कर आते हैं।
एक बात और कि उनकी पुत्री, जिसका जन्म उस समय हुआ था जब हम लोग एक साथ विंध्यनगर में थे, तो वह मेरे सामने आकर खड़ी हुई, अपनी कमर पर हाथ रखकर। वो यह उम्मीद कर रही थी कि मैं उसको नमस्कार करूंगा और मेरा मानना है कि नमस्कार अगर करना है तो उसको ही करना चाहिए।
खैर इसके बाद मेरे बॉस को शिकायत की गई कि कैसे आदमी को भेज दिया, उसने मेरी बीवी को नमस्ते नहीं की।
और बातें बाद में, फिलहाल निदा फाज़ली साहब की एक गज़ल के कुछ शेर शेयर कर लेते हैं-

बदला न अपने आप को, जो थे वही रहे
मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे।
दुनिया न जीत पाओ तो हारो न खुद को तुम,
थोड़ी बहुत तो ज़ेहन में नाराज़गी रहे।
अपनी तरह सभी को किसी की तलाश थी,
हम जिसके भी करीब रहे, दूर ही रहे।
गुज़रो जो बाग से तो दुआ मांगते चलो,
जिसमें खिले हैं फूल वो डाली हरी रहे।

नमस्कार।

2 comments