सूरज सनीम जी का लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ जिसे ज़नाब तलत अजीज़ ने फिल्म- डैडी के लिए गाया है और यह गीत अनुपम खेर जी पर बड़ी सुंदरता से और खूबसूरत संदर्भ में फिल्माया गया है।

कुल मिलाकर बात इतनी है  कि हम ज़िंदगी में जो पाना चाहते हैं, उसे पाने के लिए बहुत  सी बार वैसा बन जाते हैं, या लोग और परिस्थितियां हमे बना देती हैं, जैसा हमें नहीं बनना चाहिए।

लीजिए प्रस्तुत है ये खूबसूरत गीत-

आईना मुझसे मेरी पहेली सी सूरत माँगे
मेरे अपने मेरे होने की निशाानी माँगें।

मैं भटकता ही रहा दर्द के वीराने में
वक्त लिखता रहा चेहरे पे हर एक पल का हिसाब
मेरी शोहरत मेरी दीवानगी की नज़्र हुई
पी गयी मय की ये बोतल मेरे गीतोँ की किताब
आज लौटा हूँ तो हँसने की अदा भूल गया
ये शहर भूला मुझे मैँ भी इसे भूल गया।

मेरे अपने मेरे होने की निशाानी माँगें
आईना मुझसे मेरी पहेली सी सूरत मांगे। 

मेरा फन फ़िर मुझे बाजार में ले आया है

ये वो जां है कि जहाँ मेहर-ओ-वफ़ा बिकते हैं
बाप बिकते हैं और लख्ते जिगर बिकते हैं

कोख बिकती है दिल बिकता है सर बिकते हैं
इस बदलती हुई दुनिया का खुदा कोई नही
सस्ते दामों मे हर रोज खुदा बिकते हैं।

मेरे अपने मेरी होने की निशानी मांगे
आईना मुझसे मेरी पहेली सी सूरत माँगे।

हर खरीदार को बाजार मे बिकता पाया
हम क्या पाएंगे किसी ने भी यहाँ क्या पाया
मेरे एहसास मेरे फूल कहीं और चलें
बोल पूजा मेरी बच्ची कहीं और चलें।

आज के लिए इतना ही, नमस्कार।

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