यादों के समुंदर से एक और मोती, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग!

मैंने कितनी नौकरियों और अलग-अलग स्थानों पर तैनाती के बहाने से अपनी राम-कहानी कही है, याद नहीं। लेकिन आज दो नौकरियों की याद आ रही है, जिनका ज़िक्र नहीं हुआ। जाहिर है ये काम मैंने शुरू के समय में, बेरोज़गार रहते हुए, शाहदरा में निवास के समय ही किए थे।

एक नौकरी थी फिल्म देखने की, और इस नौकरी के दौरान मैंने एक सप्ताह तक फिल्म देखी, फिल्म थी ‘हमराज़’, हर रोज़ फिल्म के चारों शो! मैं तैनात था फिल्म वितरक की तरफ से, डिस्ट्रीब्यूटर के नाम से ज्यादा जानते हैं शायद उसको, और मेरा काम था कि हर शो शुरू होने के बाद, प्रत्येक श्रेणी में कितनी सीटें खाली बची थीं यह देखना और यह विवरण मैंने दे दिया संबंधित व्यक्ति को, उसके बाद मैं चाहूं तो फिल्म देखता रहूं या बाहर टहलकर अगला शो शुरू होने का इंतज़ार करूं।

मैं रहता था शाहदरा में, और यह ड्यूटी मेरी गांधी नगर के किसी सिनेमा हॉल में लगी थी, इस प्रकार शो के बीच में घर जाकर वापस आने की तो गुंजाइश नहीं थी। मैंने एक-दो बार तो फिल्म लगभग पूरी देखी, उसके बाद अक्सर मैं गाने सुनने के लिए हॉल में आ जाता था, जबकि सामान्यतः लोग इसका उल्टा करते हैं। शायद पहली बार महेंद्र कपूर के कई गाने इस फिल्म में आए थे और वे बहुत लोकप्रिय भी हुए थे। ‘न मुंह छुपा के जियो और न सर झुका के जियो’ आदि।

अगर मुझे सही याद है तो इसी फिल्म के लिए महेंद्र कपूर को फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था और जैसा मैंने पढ़ा है, उस समय के किसी स्थापित गायक ने उनको बधाई तक नहीं दी थी। लेकिन इस घटना के अगले दिन, उदार हृदय वाले अमर गायक मुकेश जी महेंद्र कपूर जी के घर बधाई देने चले गए थे। इस घटना का महेंद्र कपूर जी ने बड़े आदर के साथ उल्लेख किया है।

खैर, मैं अपनी ड्यूटी की बात कर रहा था, फिल्म के नायक राजकुमार तो अपनी अदाओं के लिए जाने ही जाते हैं, फिल्म में एक नई हीरोइन भी आई थी, जो बाद में पता नहीं कहाँ चली गई। फिल्म की कहानी तो बिल्कुल याद नहीं है (वैसे मेरा कहानी सुनाने का इरादा बिल्कुल नहीं है) हाँ राजकुमार के सफेद जूते ध्यान में आते हैं, शायद उनकी कहानी के सस्पेंस में, विशेष भूमिका थी।

यह किस्सा मैंने सुनाया एक सप्ताह की नौकरी का, उसका पैसा कितना मिला था याद नहीं और शायद बाद में वितरक को मेरी ज़रूरत नहीं पड़ी।

अब दूसरी नौकरी की कहानी सुना देता हूँ, ये नौकरी चली सिर्फ एक दिन। कोई टायर री-ट्रेडिंग कंपनी थी, उसकी तरफ से अन्य लोगों की तरह मुझे भी तैनात कर दिया गया था, एक पैट्रोल पंप पर। शायद झंडेवालान के पास था पेट्रोल पंप, सही याद नहीं।

तो हमको वहाँ पेट्रोल पंप पर रहना था, ऐसा दिखाना था कि हम पेट्रोल पंप के ही लोग हैं। जो लोग पेट्रोल भरवाने आते हैं, उनसे ठीक से बात करनी थी, कोई सहायता संभव हो तो करनी थी और निगाह टिकाये रखनी थी उनकी गाड़ी के टायरों पर, अगर कोई टायर घिसा हुआ मिल गया, तब हमारा काम था कि उनके शुभचिंतक बनकर उनको बताएं कि आपको टायर रीट्रेड कराने की ज़रूरत है, और हम आपकी सहायता के लिए मौज़ूद हैं, हम यहीं घिसा हुआ टायर निकालकर, उसके स्थान पर एक काम-चलाऊ टायर लगा देंगे और अगले दिन आप अपना री-ट्रेड किया हुआ टायर ले जा सकते हैं।

कुल मिलाकर किस्सा इतना कि दिन भर के प्रयास के बाद मुझे एक ग्राहक मिल गया। मुझसे काफी देर तक मालिक ने पूछा कि आपने उसको कैसे तैयार किया।

मैं इस सफलता से काफी उत्साहित था, लेकिन शाम के समय कुछ ऐसा हुआ कि मैं फिर से काम पर नहीं गया। कंपनी के मालिक शायद सरदार जी थे, उन्होंने मुझसे कहा- “मि. शर्मा, यू मे नॉट बी वेल ड्रेस्ड, बट यू मस्ट बी वेल प्रेस्ड”।

अब फक़ीरी का स्वभाव है, नौकरी रहे न रहे, लेकिन मेरा अपना स्वभाव रहा है और उसको बदलना आसान नहीं है।

मैंने कभी लिखा भी था-

क्रीज़ बनाए रखने की कोशिश में,

बिता देते हैं पूरा दिन-

इस्तरी किए हुए लोग’

ऐसा लगता है कई बार कि इस्तरी बंदे के कपड़ों पर नहीं, बल्कि उसकी पर्सनैलिटी पर हुई है। इस प्रकार, एक दिन की उस नौकरी का समापन हुआ।

आज हरिवंश राय बच्चन जी का एक गीत पढ़ लेते हैं-

मैं जीवन में कुछ न कर सका!

जग में अँधियारा छाया था,
मैं ज्‍वाला लेकर आया था
मैंने जलकर दी आयु बिता, पर जगती का तम हर न सका!
मैं जीवन में कुछ न कर सका!

अपनी ही आग बुझा लेता,
तो जी को धैर्य बँधा देता,
मधु का सागर लहराता था, लघु प्‍याला भी मैं भर न सका!
मैं जीवन में कुछ न कर सका!

बीता अवसर क्‍या आएगा,
मन जीवन भर पछताएगा,
मरना तो होगा ही मुझको, जब मरना था तब मर न सका!
मैं जीवन में कुछ न कर सका!

नमस्कार।

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