आज एक प्रसिद्ध गज़ल के बारे में बात कर लेते हैं, जिसके बारे में बहुत से लोग कहते हैं कि यह बहादुर शाह ज़फर साहब की लिखी हुई है, लेकिन यह वास्तव में  मुज़्तर ख़ैराबादी जी ने लिखी थी, जो जावेद अख्तर जी के दादा तथा जां निसार अख्तर साहब के पिता थे। इस गज़ल को रफी साहब ने तो अपनी दिलकश आवाज में गाया ही था, बाद में श्री तलत अजीज़ ने भी इसे गाया है, संभव है कि श्री जगजीत सिंह ने भी गाया हो।

कुल मिलाकर गज़ल के भाव यह हैं कि हम दुनिया में हैं, तो क्या हुआ करोड़ों जीव यहाँ जन्म लेते हैं और मर जाते हैं। हमारे होने की सार्थकता तभी है जब हमारे कारण किसी की आंखों में चमक आ जाए, कोई अपने को धन्य महसूस कर, किसी के दिल को आराम मिले, हम किसी के प्यारे दोस्त  हों, ऐसा हो  कि मरने के बाद भी लोग हमें बार-बार याद करें। ऐसा नहीं है  तो आप एक मुट्ठी राख-मिट्टी के अलावा कुछ नहीं हैं।

अब बाकी तो आप गज़ल पढ़कर आनंद लीजिए ना!

लीजिए प्रस्तुत है ये गज़ल-

न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ |
न दवा-ए-दर्द-ए-जिगर हूँ मैं न किसी की मीठी नज़र हूँ मैं
न इधर हूँ मैं न उधर हूँ मैं, न शकेब हूँ न क़रार हूँ |
मेरा वक़्त मुझ से बिछड़ गया मेरा रंग-रूप बिगड़ गया
जो ख़िज़ाँ से बाग़ उजड़ गया मैं उसी की फ़स्ल-ए-बहार हूँ |
पढ़े फ़ातिहा कोई आए क्यूँ ,कोई चार फूल चढ़ाए क्यूँ
कोई आ के शम्अ’ जलाए क्यूँ मैं वो बेकसी का मज़ार हूँ |
न मैं लाग हूँ न लगाव हूँ न सुहाग हूँ न सुभाव हूँ
जो बिगड़ गया वो बनाव हूँ जो नहीं रहा वो सिंगार हूँ |
मैं नहीं हूँ नग़्मा-ए-जाँ-फ़ज़ा मुझे सुन के कोई करेगा क्या
मैं बड़े बिरोग की हूँ सदा मैं बड़े दुखी की पुकार हूँ |
न मैं ‘मुज़्तर’ उन का हबीब हूँ न मैं ‘मुज़्तर’ उन का रक़ीब हूँ
जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ जो उजड़ गया वो दयार हूँ
                                                                           -मुज़्तर ख़ैराबादी

नमस्कार।