182. टूट जाते हैं जहाँ पर ग्लोब के धागे…

Posted by

श्री रमेश रंजक जी के एक गीत की पंक्तियां हैं-

पेट की पगडंडियों के जाल से आगे,
टूट जाते हैं जहाँ पर ग्लोब के धागे,
मनुजता की उस सतह पर छोड़ जाते हैं,
दिन हमें जो तोड़ जाते हैं,
वो इकहरे आदमी से जोड़ जाते हैं।

इस कविता में मुख्यतः कहा यही गया है कि सामान्यतः इंसान पेट भरने के उपक्रम में लगा रहता है, अपने देश और प्रदेश की सीमाओं में बंधा रहता है। अक्सर लोग अपने देश और यहाँ तक कि प्रदेश की सीमाओं से आगे सोचते ही नहीं हैं। कविता में कहा गया है कि जब हम मुसीबत झेलते हैं, तब बहुत सी बार नक्शे पर, ग्लोब में बनी सीमाएं धागों की तरह टूट जाती हैं।
वैसे देखा जाए तो भारतीयों के बीच पर्यटन का शौक बहुत अधिक नहीं है। सरकार ने काफी पहले एलटीसी का प्रावधान कर्मचारियों के लिए किया, उससे देश के भीतर पर्यटन को काफी हद तक बढ़ावा मिला।
हम बचपन में जो कहानियां सुनते हैं, उनमें अक्सर ऐसा कहा जाता है कि पहाड़ी के या समुद्र के पार कोई राक्षस रहता था और राजकुमार वहाँ गया और उसने राजकुमारी को छुड़ाया।
मतलब हमारे मन में अक्सर ऐसा बिठा दिया जाता है कि परदेस में, सात समंदर पार हम जैसे इंसान नहीं बसते। वैसे भारतीय दर्शन ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ में विश्वास करता है, कहता है कि पूरी दुनिया एक परिवार की तरह है।
ऐसा बहुत पहले से होता रहा है कि लोग काम के लिए विदेश में जाकर बस गए और वहीं के हो गए। अब जबकि दुनिया छोटी होती जा रही है, लोग बहुत कम समय में आना-जाना कर सकते हैं। ऐसे में बहुत से परिवारों के बच्चे विदेशों में काम कर रहे हैं। इस प्रकार अब भारतीय काफी बड़ी संख्या में विदेश आने-जाने लगे हैं और बहुत लोग बड़े आश्चर्य से देखते हैं, अरे वो भी हम जैसे हैं।
पश्चिम में तो पर्यटन का शौक पहले से ही बहुत है। लोग नौकरी जॉइन करते हैं, ऋण लेकर मकान लेते हैं और दुनिया का भ्रमण करते हैं और फिर जीवन भर उस ऋण को चुकाते रहते हैं। यह अति साधारण लोगों की बात है, जो संपन्न हैं वे तो बार-बार आना-जाना करते रहते हैं।
बातें बहुत हैं, लेकिन मूल बात यह कि आप अपने जीवन में जितने सुदूर स्थानों का भ्रमण कर सकें, जितने अधिक किस्म के लोगों से मिल सकें, आप आंतरिक रूप से उतना ही संपन्न अनुभव करेंगे।

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ
ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ ।

नमस्कार।