#IndiSpire

आज इंडिस्पायर पर सुझाए गए विषय के आधार पर, आलेख लिखने का प्रयास कर रहा हूँ- #MyPhilosophyOfLife
सबसे पहले तो निदा फाज़ली साहब की गज़ल के कुछ शेर याद आ रहे हैं-

दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है,
मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है।
ग़म हो कि ख़ुशी दोनो कुछ देर के साथी है
फिर रास्ता ही रास्ता हैं हंसना है न रोना है।

दीवार फिल्म का मशहूर संवाद है- स्मगलर अमिताभ बच्चन कहते हैं- आज मेरे पास गाड़ी है, बंगला है, बैंक बैलेंस है, तेरे पास क्या है, तब उनका छोटा भाई, शशि कपूर कहता है- ‘मेरे पास मां है’।
जीवन में हम क्या करना चाहते हैं, क्या पाना चाहते हैं, क्या है उद्देश्य जीवन जीने का!
जब लोग दर्शन की बात करते हैं, विशेष रूप से भारतीय दर्शन की बात करते हैं, तब यहाँ से शुरू करते हैं- हम कौन हैं, कहाँ से आए हैं, क्या करने के लिए यहाँ आए हैं?
खैर मैं उतनी ऊंची बातें करने की पात्रता नहीं रखता।
हम देखते हैं कि हमारी इस दुनिया में इंसान के अलावा और बहुत सारे जीव-जंतु हैं, जंगली और पालतू पशु-पक्षी हैं, लेकिन ऐसा नहीं लगता कि उनमें से किसी में सोच-विचार की अधिक शक्ति है। उनकी सोच-समझ केवल जिंदा बचे रहने तक सीमित है। जिसके लिए चींटी से लेकर हाथी तक, सभी छोटे-बड़े प्राणी मेहनत करते हैं।
कोई हिरण अगर बैठकर यह सोचने लगे कि ‘मैं यहाँ क्यों आया हूँ’ तब शायद एक क्षण बाद ही उसको सोचना होगा कि ‘मैं यहाँ क्यों आया था’? क्योंकि उनके लिए शिकार होने से बचे रहना भी बहुत जरूरी है।
जिस प्रकार सभी प्राणियों के लिए जीवित रहना जरूरी है, मनुष्य के लिए भी, जीवित रहने के लिए खाना तो ज़रूरी है ही, लेकिन वह स्वाद भी बदलते रहना चाहता है। हाँ बिल्कुल अपने शौक पूरे करते हुए जीने के लिए उसको एक अच्छा रोज़गार या व्यवसाय भी चाहिए, अच्छा घर भी, अपनी क्षमता के अनुसार चाहिए, अलग-अलग मौसमों का मुक़ाबला करने के लिए ठंडे-गरम कपड़े भी चाहिएं।
इतना सब-कुछ तो उस जिंदा बने रहने की कशमकश का हिस्सा हैं, जो सभी प्राणियों की ज़रूरत हैं, इंसान की कुछ ज्यादा हैं। इसके लिए जैसा कहा- रोज़गार, बैंक-बैलेंस आदि की ज़रूरत होती है। और हाँ मनुष्य दुनिया भी घूमना चाहता है।
जिंदा बने रहने की इस कशमकश के बाद बात आती है, ज़िंदगी से जुड़े दर्शन की, फिलॉसफी की, कि आप एक इंसान के रूप में अपने लिए, दुनिया के लिए क्या करना चाहते हो, जिंदा बने रहने के अलावा!
बेशक जिंदा बने रहना, जैसे सभी प्राणियों के लिए जरूरी होता है, वैसे ही मनुष्य के लिए भी है और मनुष्यों का समाज एक सभ्य समाज है, हमने एक तंत्र विकसित किया है, अपनी ज़रूरतों के अनुसार, वह लोकतंत्र हो अथवा कोई कोई और व्यवस्था हो, जो यह सुनिश्चित करती है कि व्यवस्था बनी रहे और जब व्यवस्था भंग होती है, तब हम कहते हैं कि जंगल राज आ गया है।
बेशक इंसान का सुरक्षित रहना और पेट भरना तो मूलभूत आवश्यकता हैं, और सभी प्राणियों की तरह। मगर इसके बाद क्या?
आज दुनिया में बहुत सी असमानताएं हैं, कुछ असमानताएं या असमानता की भावनाएं तो ऐसी भी हैं, जो शायद कभी खत्म नहीं होने दी जाएंगी क्योंकि वे तो नेताओं की रोजी-रोटी हैं, जी हाँ अब मैं विशुद्ध रूप से हिंदुस्तान की बात कर रहा हूँ, वह सामाजिक हो, धार्मिक हो या कोई और! अगर सभी लोग एक जैसी ही मांग करने लगेंगे, आपस में लडेंगे नहीं तो नेताओं की दाल कैसे गलेगी!
खैर मैं यहाँ नेताओं के बारे में ज्यादा बात नहीं करूंगा। मैं इस बात पर बल देना चाहूंगा कि अगर हर मनुष्य, जिसके पास सामर्थ्य है, वह प्रयास करे कि जो लोग जीवन की दौड़ में किसी भी तरह पीछे रह गए हैं, उनमें से कुछ की वह मदद करेगा, तो यह दुनिया ज्यादा सुंदर, ज्यादा सुहावनी हो जाएगी।
अब ज़िंदगी के बारे में एक दो बातें शायरों की ज़ुबानी, फिराक़ गोरखपुरी साहब ने तो ज़िंदगी को लाइलाज बीमारी बता दिया-

मौत का भी इलाज हो शायद
ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं|

और भी बहुत सी बातें कही जा सकती हैं ज़िंदगी के बारे में, लेकिन मैं आखिर में, फिल्म- जागते रहो के लिए शैलेंद्र जी की लिखी ये पंक्तियां दोहराना चाहूंगा-

दिल ने हमसे जो कहा, हमने वैसा ही किया,
फिर कभी फुर्सत में सोचेंगे बुरा था या भला।
ज़िंदगी ख्वाब है, ख्वाब में झूठ क्या,
और भला सच है क्या?

फिलॉसफी की बात, सीरियसली करना, अपने बस की बात नहीं है जी!

नमस्कार।