अभी दो दिन पहले ही ज़िंदगी के बारे में एक ब्लॉग पोस्ट लिखी थी किसी बहाने से, आज फिर खयाल आया कि क्या ज़िंदगी के लिए एक ब्लॉग पोस्ट काफी है! वैसे मैंने पहले भी इस शीर्षक को लेकर लिखा है, और जब तक ज़िंदगी जीते रहेंगे, यह विषय तो सार्थक रहेगा ही। मूड के अनुसार, तात्कालिक मनःस्थिति के अनुसार और कैसा समय चल रहा है, इस आधार पर ज़िंदगी के बारे में अलग-अलग तरह की बातें की जा सकती हैं और कवि-शायर ये काम करते ही रहते हैं, फिर हम अपना दिमाग क्यों लगाएं जी!
जैसे किसी ने कहा कि-

ज़िंदगी से बड़ी सज़ा भी नहीं,
और क्या ज़ुर्म है, पता भी नहीं।

एक और शायर कहते हैं-

अदा हुआ न क़र्ज़ और वजूद ख़त्म हो गया
मैं ज़िंदगी का देते देते सूद ख़त्म हो गया।

और अहमद फराज़ साहब क्या कहते हैं-

कुछ इस तरह से गुज़ारी है ज़िंदगी जैसे
तमाम उम्र किसी दूसरे के घर में रहा।

और मेरा एक प्रिय फिल्मी गीत, फिल्म- ‘आग’ से, जिसे मुकेश जी ने बड़े दिलकश अंदाज़ में गाया है-

ज़िंदा हूँ इस तरह कि गम-ए-ज़िंदगी नहीं
जलता हुआ दिया हूँ, मगर रोशनी नहीं।

यूं मुद्दतों हुई हैं किसी से ज़ुदा हुए,
लेकिन ये दिल की आग अभी तक बुझी नहीं।

आने को आ चुका था किनारा भी सामने,
खुद उसके पास ही मेरी नैया गई नहीं।

होठों के पास आए हंसी, क्या मज़ाल है,
दिल का मुआमला है, कोई दिल्लगी नहीं।

ये चांद, ये हवा ये फिज़ा, सब हैं मांद-मांद,
जब तू नहीं तो इनमें कोई दिलकशी नहीं।

ज़िंदगी जो भी देती है उसे स्वीकार करना ही होता है, आज ये गीत स्वीकार कीजिए।

नमस्कार।