191 . दुनिया की सैर कर लो!

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#SayYesToTheWorld
हम हिंदुस्तानी हैं, अपने देश से प्यार करते हैं। लेकिन आज हम पूरी दुनिया में फैले हुए हैं
बहुत पहले से, जब यात्रा के साधन इतने अच्छे नहीं थे, तबसे हमारे बहुत से लोग विदेशों में जाकर बसते रहे हैं, जो एग्रीमेंट के तहत काम के लिए जाते थे और उनको देशी भाषा में ‘गिरमिटिया’ मजदूर कहा जाता है। ऐसा केवल हिंदुस्तान से बाहर जाने के मामले में नहीं है, विदेशों के भी बहुत से लोग यहाँ बसते रहे हैं, जैसे बहुत से शहरों में आपको चीनी, नेपाली लोग काफी बड़ी संख्या में मिल जाएंगे। बंग्लादेशी लोग तो बहुत से नगरों में घरों में काम करने के लिए मुख्य रूप से मिलते हैं।
भारत से विदेशों में जाकर बस जाने की बात तब थी, जब आना-जाना इतना आसान नहीं था। आज की तारीख में लोग एक निश्चित प्लान बनाकर बाहर जाते हैं और काफी संख्या में लोग पर्याप्त कमाई करने के बाद वापस भी आ जाते हैं।
वैसे विदेशों में बसने का अथवा नौकरी करने का विषय नहीं है आज का!
बहुत पहले पर्यटन अथवा तीर्थ यात्रा के लिए लोगों का लक्ष्य इतना भर होता था भारत में कि देश के चारों कोनों में बने तीर्थों तक लोग जाते थे, और घर के लोगों से इस प्रकार गले मिलकर जाते थे कि अगर जीवित वापस लौट पाए तो फिर मिलेंगे।
जो अनिश्चितता की स्थिति पहले भारत में तीर्थ स्थानों तक जाकर वापस लौटने के बारे में होती थी, वैसी आज दुनिया के किसी भी कोने के लिए नहीं है। और फिर आज दुनिया के हर कोने में आपको भारतीय मिल जाएंगे।
मैं ऐसा मानता हूँ कि हमें योजना बनाकर देश के और विदेश के रुचिकर स्थानों का भ्रमण करना चाहिए और प्रत्येक स्थान की विशेषताओं, वहाँ की संस्कृति और लोगों के बारे में जानना चाहिए।
मैंने अभी तक जहाँ भारत के अनेक राज्यों का भ्रमण किया है, जिनमें केरल, तमिलनाडु और अंडमान शामिल हैं, वहीं विदेश यात्राओं में अभी तक- दुबई, शारजाह आदि संयुक्त अरब अमीरात के राज्यों और दार-ए-सलाम, तंजानिया की यात्रा की है। इन देशों में रहते हुए वास्तव में मुझे ज्यादातर यह लगा ही नहीं कि मैं देश से बाहर हूँ।
मैं अपने अनुभव के आधार पर भी यह कहना चाहूंगा कि जितना हम विभिन्न संस्कृतियों के लोगों से मिलेंगे, हमारा दृष्टिकोण और अधिक व्यापक होगा और हमारा और अधिक मन होगा भ्रमण करने का। बेशक हम अपने देश के राज्यों से प्रारंभ कर सकते हैं, जहाँ प्रकृति की और ऐतिहासिक धरोहरों की समृद्धि फैली हुई है और उसके बाद हम अपने बजट के अनुसार, दुनिया के अनेक स्थानों की यात्रा बना सकते हैं।
अपने स्वभाव के अनुसार मुझे राज कपूर जी की फिल्म- ‘एराउंड द वर्ल्ड’ का गीत याद आ रहा है, जिसे शैलेंद्र जी ने लिखा है, मुकेश जी और शारदा जी ने गाया है, संगीत-संगीत- शंकर जयकिशन जी का है, वह शेयर करना चाहूंगा-

दुनिया की सैर कर लो, दुनिया की सैर कर लो
इन्साँ के दोस्त बनकर, इन्साँ से प्यार कर लो
अराउंड द वर्ल्ड इन 8 डॉलर्स…

लॉस ऐन्जोलिस भड़कीला, जहाँ हॉलीवुड है रंगीला
देखो डिज़्नीलैंड में आकर, परियों का देश धरती पर
दुनिया की सैर कर लो.

जब ग्रैंड कैनियन देखा, याद आ गया वो अनदेखा
नहीं दुनिय में तेरा सानी, अरे वाह रे वाह मयामी
दुनिया की सैर कर लो.

हम अमन चाहने वाले, हम प्यार पे मरने वाले
एक बात कहेंगे सबसे, नफ़रत को मिटा दो जग से
इन्सान के हाथ का टोना, मिट्टी को बनाया सोना
ये वाशिंगटन अलबेला, न्यूयॉर्क शहर का मेला
दुनिया की सैर कर लो.

लन्दन की दौड़ दीवानी, पेरिस की शाम मस्तानी
क़ुदरत के ये खेल निराले, ज़रा देख ले देखने वाले
बर्लिन का बदलता चेहरा, और रोम का रंग सुनहरा
वेनिस में नाव की सैरें, ये गीत गाती हुई लहरें
दुनिया की सैर कर लो.

वैसे मैं समझता हूँ कि शैलेंद्र जी के इस गीत में दुनिया के बहुत से स्थानों की खूबसूरती और दुनिया से प्रेम की भावना को बहुत खूबसूरती से उतारा गया है।

नमस्कार।

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