आज फिर से, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग, जो पिछले वर्ष अगस्त में लिखा था-
आज गोवा में आए एक महीना हो गया। 3 जुलाई को दोपहर बाद यहाँ पहुंचे थे, गुड़गांव से। बहुत से फर्क होंगे जीवन स्थितियों में, जिनके बारे में समय-समय पर, प्रसंगानुसार चर्चा की जा सकती है।
एक फर्क जो आज अचानक महसूस किया, सुबह अपनी बालकनी में टहलते हुए, उस पर चर्चा कर रहा हूँ। मुझे अचानक खयाल आया कि यहाँ तो हमारे बालकनी के दरवाजे अधिकांश समय खुले ही रहते हैं, जहाँ से हम बारिश का आनंद लेते रहते हैं, बंद करते हैं तो बस तेज धूप से अथवा रात में मच्छरों के आक्रमण से बचने के लिए।
गुड़गांव में आखिरी 6 महीने हम एक बहुत सुंदर सोसायटी में, नवीं मंज़िल पर रहे, उस अवधि को छोड़ दें तो बालकनी अथवा छत का दरवाज़ा अधिक देर तक खुला रखने की हमारी हिम्मत ही नहीं थी। एकाध बार तो यह हुआ कि दरवाज़ा कुछ देर खुला रहा तो वानरराज आकर, फ्रिज में से कुछ फल आदि निकालकर खा गए, बाकी काफी कुछ फैला गए। यहाँ अभी तक मुझे वानर जाति के दर्शन नहीं हुए हैं। वैसे यहाँ भी हम सोसायटी में हैं, जहाँ इसकी संभावना कम है, लेकिन बाहर भी जितने इलाके में घूमा हूँ, कोई बंदर नहीं दिखा है।
यहाँ जो दिखा है, वह ये कि जिस प्रकार वाराणसी में अथवा उत्तरी भारत के अन्य नगरों में भी, गायों का सम्मेलन सड़क अथवा चौराहे के बीचोंबीच चलता रहता है, यहाँ पर कुत्ते उसी तरह बैठे रहते हैं। कुत्ते उधर भी बहुत हैं, लेकिन उनके बीच भाईचारा मुझे यहाँ ज्यादा लगा, वैसे कुछ कहते नहीं हैं, लेकिन डर तो बना ही रहता है।
फिर से दिल्ली-गुड़गांव को याद करता हूँ, बंदरों और कुत्तों के कारण होने वाली अप्रिय घटनाएं वहाँ काफी समय से बहुत अधिक हो गई हैं, लेकिन कोई इस तरफ ध्यान देने वाला नहीं है। पिछले दिनों एक खबर पढ़ी थी कि हरियाणा में लंबे समय से कुत्तों की नसबंदी का कार्यक्रम चल रहा है और इस पर बहुत बड़ी राशि खर्च की जा चुकी है। जिस प्रकार वहाँ कुत्तों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है, उसे देखते हुए तो यही लगता है कि नसबंदी कुत्तों की नहीं, उन महान लोगों की, किए जाने की ज़रूरत है, जो इस बजट को खपाने में लगे हैं।
वैसे हमारे लोकतंत्र में सभी प्राणियों का कितना आदर है, यह तो अमरीकी राष्ट्रपति ने उस समय महसूस कर लिया होगा, जब राष्ट्रपति भवन में उनके सम्मान के दौरान एक श्वान महोदय वहाँ टहलते हुए आ गए थे। सभी जीवों से प्रेम, दया करना अलग बात है। लेकिन यह भी फैसला करना होगा कि हमारे शहरों में आज़ादी के साथ इंसानों को रहना है या कुत्तों और बंदरों को! इतना ही नहीं, जो गाय आदि आवारा घूमती हुई पाई जाते हैं, उनको गौ-शालाओं में भेज दिया जाना चाहिए और उनके मालिकों पर भारी जुर्माना किया जाना चाहिए।
मैंने कहीं पढ़ा था कि किसी व्यक्ति की गाय या भैंस ट्रेन के नीचे आकर मर गई, उसने रेलवे पर केस किया। न्यायालय ने उसको लताड़ लगाई कि उसकी लापरवाही के कारण ट्रेन के यात्रियों को जान का खतरा पैदा हो गया था।
मैं मानता हूँ कि इस संबंध में गंभीरतापूर्वक विचार किया जाना चाहिए कि आवारा पशुओं को सड़कों और धार्मिक, सार्वजनिक स्थलों से दूर किया जाए, इसके साथ धार्मिक भावनाओं को न जोड़ा जाए।
गौशालाओं जैसे प्रबंध अन्य आवारा पशुओं के लिए तात्कालिक रूप से करके, उनकी प्रभावी नसबंदी की जानी चाहिए, जिससे उनकी संख्या क्रमशः कम होती जाए।
ऐसा भी कई बार हुआ है कि हवाई जहाज के रनवे पर कोई जानवर आ गया है और दुर्घटना होते-होते बची है। रेलवे लाइन पर तो आवारा पशु घूमते ही रहते हैं, लोगों को कुत्ते अथवा बंदर द्वारा काटे जाने की घटनाएं भी होती रहती हैं। इस संबंध में सरकारें मज़बूत कदम उठाएं, लेकिन सरकार खुद कभी कुछ नहीं करती है, उसको मज़बूर करना होगा। जब आरक्षण की मांग करने से फुर्सत मिले तब इस बारे में भी सोचिएगा।
एक कवि की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

निर्माण कार्य चालू है,
पुल बांध रहे बंदर-भालू हैं,
शायद राम ही पार उतर पाएं,
क्योंकि एक बोरी सीमेंट में
आठ बोरी बालू है।

नमस्कार।