आज मोहम्मद रफी जी के मधुर और बुलंद स्वर में, कैफी आज़मी साहब का लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो शोला और शबनम फिल्म के लिए ज़नाब मोहम्मद ज़हूर तथा खैयाम जी के संगीत निर्देशन में रिकॉर्ड किया गया था।

इन गीतों को सुनने पर यह गर्व होता है कि पहले कैसे महान शायर फिल्मों से जुड़े थे, कितने महान गायक और संगीतकार थे और गीत तैयार करने के लिए कितनी मेहनत की जाती थी। अब भी अच्छे गीत आते हैं, लेकिन उनका प्रतिशत बहुत कम हो गया है।

कैफी साहब के लिखे इस सुंदर गीत को रफी साहब ने पूरे मन से गाया है और अपनी मधुर वाणी से इसे लोगों के दिलों पर अंकित कर दिया है- ‘अब वो प्यार न उस प्यार की यादें बाकी…’ ।

पहले की फिल्मों में खास तौर पर दिल की दुनिया उजड़ने के प्रसंग काफी अधिक आते थे, शायद प्रेम भी उस समय अधिक होता था, आज तो विकल्प खुले रहते हैं। पहले का हीरो लगता था कि रोमांस कर रहा है तो ठीक, नहीं तो शांत ज्वालामुखी बन जाता था, 15 मिनट में हीरो की दाढ़ी 1 सेंटीमीटर बढ़ जाती थी!

यह बात ऐसे ही मज़ाक में कह दी, असल में उस समय दिल में झांकने का अवसर ज्यादा मिलता था, आज बाहरी घटनाएं ज्यादा होती हैं, तब भीतरी भावनाओं को ज्यादा दर्शाया जाता था।

वैसे यह भी होता है कि सबको अपना ज़माना अच्छा लगता है, इसलिए शायद मैं भी ‘नॉस्टेल्जिया’ के तहत ही यह सब कह रहा हूँ।

छोड़िए जी, आप इस सुंदर गीत का आनंद लीजिए-

जाने क्या ढूँढती रहती हैं ये आँखे मुझमें
राख के ढ़ेर में शोला है ना चिंगारी है।

अब ना वो प्यार उस प्यार की यादें बाकी
आग वो दिल में लगी कुछ ना रहा, कुछ ना बचा
जिसकी तस्वीर निगाहों में लिये बैठी हो
मैं वो दिलदार नहीं उसकी हूँ खामोश चिता।

जिंदगी हँस के गुजरती थी बहुत अच्छा था
खैर हँस के ना सही रो के गुजर जायेगी
राख बरबाद मोहब्बत की बचा रखी है
बार बार इसको जो छेड़ा तो बिखर जायेगी।

आरजू ज़ुर्म, वफ़ा ज़ुर्म, तमन्ना है गुनाह
ये वो दुनिया है जहाँ प्यार नहीं हो सकता
कैसे बाजार का दस्तूर तुम्हे समझाऊँ
बिक गया जो वो खरीदार नहीं हो सकता।

नमस्कार।