199. हम जिस तरफ़ चले थे उधर रास्ता न था!

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हमारे एक प्रसिद्ध फिल्मी अभिनेता, निर्माता, निर्देशक हुए हैं, अभी वे सक्रिय नहीं हैं, ईश्वर उनको लंबी उम्र दे, वे हैं- श्री मनोज कुमार।
फिल्म निर्माता के रूप में उन्होंने एक विशेष विषय पर फिल्में बनाई- देशप्रेम और देशभक्ति। उनकी फिल्म के एक गीत की पंक्ति है-

है प्रीत जहाँ की रीत सदा,
मैं गीत उसी के गाता हूँ,
भारत का रहने वाला हूँ,
भारत की बात सुनाता हूँ।

अचानक यह गीत याद आया तो खयाल आया कि देश, देशप्रेम एक बहुत अच्छा विषय है, लेकिन कवियों / शायरों के लिए मूलभूत विषय तो ज़िंदगी है। असल में उसके बाद ही, उससे जुड़कर ही बाकी सभी विषय आगे आते हैं।
श्रेष्ठ कवि श्री रामावतार त्यागी जी की पंक्तियां हैं-

एक हसरत थी कि आंचल का मुझे प्यार मिले,
मैंने मंज़िल को तलाशा, मुझे बाज़ार मिले,
ज़िंदगी और बता, तेरा इरादा क्या है!

इस गीत में वे ज़िंदगी को चुनौती देते हुए दिखाई देते हैं। बस इस ज़िंदगी के सफर से जुड़ी एक गज़ल शेयर कर रहा हूँ, जिसे श्री हरिहरन, पंकज उधास और शायद और भी कई गायकों ने गाया है। इस खूबसूरत गज़ल के लेखक हैं- श्री मुमताज़ राशिद।
लीजिए इस गज़ल का आनंद लीजिए-

पत्थर सुलग रहे थे कोई नक्श-ए-पा न था
हम जिस तरफ़ चले थे उधर रास्ता न था।

परछाइयों के शहर की तनहाइयां न पूछ,
अपना शरीक-ए-ग़म कोई अपने सिवा न था।

पत्तों के टूटने की सदा घुट के रह गई,
जंगल में दूर-दूर, हवा का पता न था।

राशिद किसे सुनाते गली में तेरी गज़ल,
उसके मकां का कोई दरीचा खुला न था।

पत्थर सुलग रहे थे कोई नक्श-ए-पा न था,
हम उस तरफ़ चले थे जिधर रास्ता न था।

नमस्कार।