67. इसलिए धर्म को प्यार बना!

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आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुराना ब्लॉग, इसमें जिस बाबा की बात की गई है, असल में उसके बाद एक और बाबा को सज़ा हो चुकी है –

एक बाबा को सज़ा का ऐलान होने वाला है।
अच्छा नहीं लगता कि बाबाओं को इस हालत से गुज़रना पड़े। हमारे देश में परंपरा रही है, राजा-महाराजाओं के ज़माने से, महाराजा दशरथ हों या कोई अन्य प्राचीन सम्राट, वे सभी महात्माओं को आदर देते थे, उनसे मार्गदर्शन लेते थे। मैं समझता हूँ यह परंपरा आज के लोकतांत्रिक शासकों तक जारी रही है।

एक विचार रहा है कि तामसिक वातावरण में, ऐश्वर्य और भोग-विलास के बीच रहते हुए व्यक्ति के विचार भ्रष्ट हो सकते हैं, इसलिए शासक महत्वपूर्ण और जनहित के मुद्दों पर अपने गुरू की सलाह लेते थे, जो इस राजसी वातावरण से दूर, नगर के किनारे एक कुटिया अथवा सादगीपूर्ण आश्रम में रहता था।

 

जहाँ तक आज की और सामान्य लोगों की बात है, मैं नहीं समझ पाता कि लोगों को गुरू बनाने की आवश्यकता क्यों होती है! ऐसा भी माना जाता है कि वह गुरू अपने चेलों को गुरुमंत्र देता है, जिससे उनका कल्याण सुनिश्चित होता है। और उस गुरुमंत्र के बदले, ये चेले अपने गुरू के आदेश पर कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। मेरा इसमें कतई विश्वास नहीं है और मैं यह मानता हूँ कि यह खतरनाक है।

आजकल टीवी पर ढेर सारे गुरू प्रवचन देते हुए मिल जाते हैं। मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं कि मुझे अक्सर उनके प्रवचन सुनकर बहुत अच्छा लगता है। जैसे जब मुरारी बापू रामकथा करते हैं तब उसको सुनकर मेरी आंखों में आंसू आ जाते हैं। ऐसे कई लोग हैं जिनको सुनना बहुत अच्छा लगता है।

जब आसाराम बापू प्रवचन देते थे तब वे भी बातें तो अच्छी करते थे परंतु उनका व्यक्तित्व और बॉडी लैंग्वेज मुझे कभी प्रभावित नहीं करते थे। विशेष रूप से जब वे सीटी बजाने लगते थे। आजकल तो सभी बाबा लोगों ने शायद बाबा रामदेव की प्रेरणा से, अपने साथ व्यवसाय भी काफी हद तक जोड़ लिया है।

जो बाबा अभी गिरफ्त में आए हैं, ये फिल्मों में रॉबिनहुड बनने के अलावा, किस तरह अपने भक्तों को प्रभावित करते थे, मुझे पता नहीं।

मैं परम प्रिय शिष्यों से यही अनुरोध करता हूँ कि जिस तरह आप आजकल अपने बच्चों को पढ़ाने वाले गुरुओं को परखते हैं, उसी तरह इन गुरुओं को भी परखें। इनके पास इतनी धन-संपत्ति जमा न होने दें कि उसके कारण ही इनका दिमाग खराब हो जाए।

सरकार चलाने वालों से भी अनुरोध करूंगा कि एक व्यक्ति के रूप में आप इन गुरुओं पर श्रद्धा रख सकते हैं, इनको पैसों का दान भी दे सकते हैं, लेकिन अपनी जेब से, सरकारी पैसा आपके पिताजी का नहीं है!

जो श्रद्धा के केंद्र हैं, उनके प्रति नफरत विकसित हो, यह अच्छा नहीं लगता, इसलिए हे प्यारे शिष्यों, और जो शिष्य अंध भक्ति की ओर बढ़ रहे हैं, उनके आसपास के समझदार लोगों से भी अनुरोध है कि उन्हें समझाएं कि अंधभक्त न बनें। जो अच्छी बातें हैं, उनको ही स्वीकार करें।
एक और बात, जब ऐसी कोई घटना होती है, तब राजनैतिक रूप से सक्रिय स्वयंसेवक ऐसा वातावरण बनाने लगते हैं, कि हमारी मनचाही सरकार होती तो पता नहीं क्या होता, सारे दोष वर्तमान सरकार में ही हैं, ऐसे लोगों को बात करने के लिए कुछ लाशें भी मिल जाएं तो क्या बात है!

मुझे श्री रमानाथ अवस्थी के गीत की पंक्तियां याद आ रही हैं, सभी के लिए-

जो मुझ में है, वो तुझ में है
जो तुझ में है वो सब में है।
इसलिए प्यार को धर्म बना,
इसलिए धर्म को प्यार बना।

नमस्कार।