आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट –

ज़िंदगी सिर्फ मोहब्बत नहीं कुछ और भी है,
ज़ुल्फ-ओ-रुखसार की जन्नत नहीं कुछ और भी है,
भूख और प्यास की मारी हुई इस दुनिया में
इश्क़ ही एक हक़ीकत नहीं, कुछ और भी है।
तुम अगर नाज़ उठाओ तो, ये हक़ है तुमको
मैंने तुमसे ही नहीं, सबसे मोहब्बत की है।

आज हक़ीकत और कल्पना पर आधारित कुछ फिल्मी गीतों के बारे में बात करते हैं। ऊपर जिस गीत के बोल लिखे गए हैं, वह हक़ीकत के बोझ से दबे, ज़िम्मेदार शायर के बोल हैं, जो देखता है कि दुनिया में इतने दुख हैं, ऐसे में कैसे किसी एक के प्यार में पागल हुआ जाए।

अब कल्पना की धुर उड़ान के बारे में बात कर ली जाए, जहाँ प्रेमी अपने तसव्वुर में इतना पागल है कि सामने जो हक़ीकत है उसको स्वीकार नहीं कर पाता और देखें उसकी कल्पना की उड़ान कितनी दूर तक जाती है-

चंचल, शीतल, निर्मल, कोमल, संगीत की देवी स्वर-सजनी,
सुंदरता की हर मूरत से, बढ़कर के है तू सुंदर सजनी।

दीवानगी का एक और आलम ये भी है-

ये तो कहो कौन हो तुम, कौन हो तुम,
हमसे पूछे बिना दिल में आने लगे,
नीची नज़रों से बिजली गिराने लगे।

एक और मिसाल-

मेहताब तेरा चेहरा, एक ख्वाब में देखा था,
ऐ जान-ए-जहाँ बतला,
बतला कि तू कौन है।

और जवाब-

ख्वाबों में मिले अक्सर,
एक राह चले मिलकर,
फिर भी है यही बेहतर-
मत पूछ मैं कौन हूँ।

और इसके बाद फिर हक़ीकत की पथरीली ज़मीन पर आते हैं-

देख उनको जो यहाँ सोते हैं फुटपाथों पर,
लाश भी जिनकी कफन तक न यहाँ पाती है,
पहले उन सबके लिए, एक इमारत गढ़ लूं,
फिर तेरी मांग सितारों से भरी जाएगी।

अंत में डॉ. कुंवर बेचैन की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

अर्थहीन संदर्भ हुआ अब तेरे मेरे प्यार का,

जैसे एक पुराना कागज़, फटे हुए अखबार का।

बहलाने को दिल आता है, स्वप्न कभी अभिसार का,

जैसे एक क्लर्क के घर में, आए दिन इतवार का॥

आज के लिए इतना ही!
नमस्कार।