नया दिन, नई जगह, जी हाँ लंदन में थेम्स नदी के किनारे का घर, जहाँ मुझे एक महीना रहना है। लेकिन काम वही पुराना, आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

एनटीपीसी में अपनी सेवा के दौरान बहुत से सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन से जुड़ा रहा और इस सिलसिले में अनेक जाने-माने कवियों, कलाकारों से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, बहुत से श्रेष्ठ कवियों से तो मित्रता हो गई थी, बहुतों की कविताओं/गीतों को मैंने अपने ब्लॉग में उद्धृत भी किया है।

कुछ अलग किस्म के कलाकार रहे, जैसे पण्डवानी, कठपुतली आदि का प्रदर्शन करने वाले। गायन के कार्यक्रमों में जहाँ- नितिन मुकेश, जगजीत सिंह, अनूप जलोटा आदि के कार्यक्रम हुए, वहीं आज जिस कलाकार समूह अथवा परिवार का बरबस खयाल आ रहा है, वह अपनी तरह का एक अलग कलाकार परिवार है, जिसकी अलग पहचान बनी है, ये हैं- शर्मा बंधु।
पहले जब इन कार्यक्रमों का आयोजन शुरू किया था, आठवें दशक में, उस समय मोबाइल फोन और इंटरनेट के माध्यम से संपर्क की आज जैसी सुविधाएं नहीं थीं, अतः व्यक्तिगत रूप से मिलने और कार्यक्रम निश्चित करने के लिए जाना पड़ता था, ईवेंट मैनेजर्स पर, मैंने जब तक संभव हुआ निर्भर होना स्वीकार नहीं किया।

तो शर्मा बंधु का काफी नाम उस समय था, अब तो मैं इन गतिविधियों से काफी दूर गोआ में सेवा निवृत्ति का जीवन बिता रहा हूँ, पता ही नहीं है कि आयोजनों की मार्केट में कौन चल रहा है। हाँ तो यह विचार किया गया कि शर्मा बंधुओं का कार्यक्रम रखा जाए, यह शायद 1990 के आसपास की बात है। शर्मा बंधुओं के गाए कुछ भजन उस समय काफी लोकप्रिय थे, इनमें से एक और शायद सबसे अधिक लोकप्रिय था-

जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को
मिल जाए तरुवर की छाया
ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है
मैं जबसे शरण तेरी आया, मेरे राम।

शर्मा बंधुओं की कौन सी पीढ़ी उस समय थी और कौन सी अब चल रही है, आजकल वे कार्यक्रम दे भी रहे हैं या नहीं, मुझे मालूम नहीं है। लेकिन मैंने और शायद उस कार्यक्रम का आनंद लेने वाले अधिकांश लोगों ने महसूस किया कि जिस प्रकार संगीत के लिए समर्पित घराने लोगों के मन पर छाप छोड़ते हैं, उसी प्रकार भक्ति संगीत के लिए समर्पित इस परिवार ने भी अपनी अलग पहचान बनाई है।

मुज़फ्फरनगर में इनके घर पर जब मैं संपर्क करने गया, तब मालूम हुआ कि वहाँ भी आश्रम जैसा माहौल था, एक बड़ा सा आंगन था और जहाँ तक मुझे याद है उसमें कुआं भी था। पीढ़ी दर पीढ़ी भक्ति के प्रति समर्पित इस संगीतमय संकल्प को आज प्रणाम करने का मन हुआ, जिसमें आस्था ही जीवन में आगे बढ़ने का संबल बनती है-

भटका हुआ मेरा मन था कोई
मिल ना रहा था सहारा
लहरों से लड़ती हुई नाव को जैसे
मिल ना रहा हो किनारा,
इस लड़खड़ाती नाव को ज्यों
किसी ने किनारा दिखाया,
ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है
मैं जब से शरण तेरी आया, मेरे राम।

कुल मिलाकर उस आयोजन के बाद जैसा अनुभव हुआ कि शर्मा बंधु पूरे मन से तल्लीन होकर अपने भजन और उनकी व्याख्या प्रस्तुत करते हैं, जैसे वे शिव जी के बारे में एक भजन गाते हुए कहते हैं कि वे-‘राम नाम का नशा किए हैं’, जबकि ऐसा दिखाया जाता है कि शिव जी भांग-धतूरे आदि का नशा करते हैं।

मुझे याद है कि उन्होंने इसकी भी बड़ी सुंदर व्यख्या की थी-

भवानी शंकरौ वंदे, श्रद्धा विश्वास रूपिणो

उन्होंने बताया था कि भवानी श्रद्धा की प्रतीक हैं और शंकर जी के मन में विश्वास अटूट है, भवानी का विश्वास श्रीराम जी को वन में भटकते देखकर डिग गया था और उन्होंने अपने पूर्व स्वरूप में, श्रीराम जी की परीक्षा लेने का प्रयास किया था, जिसका परिणाम उनको भोगना पड़ा था।

कुल मिलाकर आज अचानक भक्ति संगीत की परंपरा में अपनी अलग पहचान बनाने वाले इस परिवार की याद आई, मैं इनके प्रति सद्भाव एवं सम्मान व्यक्त करता हूँ।

नमस्कार।