आज स्व. रामावतार त्यागी जी का एक गीत शेयर करने का मन हो रहा है। श्री त्यागी जी जुझारु किस्म के गीतकार थे, कवि का स्वाभिमान और आत्म सम्मान उनकी रचनाओं में खूब अभिव्यक्त होता है।

इस गीत में भी उनकी पहचान के अनुरूप सशक्त और प्रभावी अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। प्रस्तुत है श्री रामावतार त्यागी जी का यह सुंदर गीत-

इस सदन में मैं अकेला ही दिया हूं
मत बुझाओ!
जब मिलेगी रोशनी मुझसे मिलेगी!

पांव तो मेरे थकन ने छील डाले,
अब विचारों के सहारे चल रहा हूं,
आंसुओं से जन्म दे–देकर हंसी को,
एक मंदिर के दिए–सा जल रहा हूं,
मैं जहां धर दूं कदम, वह राजपथ है
मत मिटाओ!
पांव मेरे, देखकर दुनिया चलेगी!

बेबसी, मेरे अधर इतने न खोलो,
जो कि अपना मोल बतलाता फिरूं मैं,
इस कदर नफ़रत न बरसाओ नयन से,
प्यार को हर गांव दफ़नाता फिरूं मैं,
एक अंगारा गरम मैं ही बचा हूं
मत बुझाओ!
जब जलेगी, आरती मुझसे जलेगी!

जी रहे हो जिस कला का नाम लेकर
कुछ पता भी है कि वह कैसे बची है
सभ्यता की जिस अटारी पर खड़े हो,
वह हमीं बदनाम लोगों ने रची है,
मैं बहारों का अकेला वंशधर हूं
मत सुखाओ!
मैं खिलूंगा तब नयी बगिया खिलेगी!

शाम ने सबके मुखों पर रात मल दी,
मैं जला हूं¸ तो सुबह लाकर बुझूंगा,
ज़िंदगी सारी गुनाहों में बिताकर,
जब मरूंगा¸ देवता बनकर पुजूंगा,
आंसुओं को देखकर मेरी हंसी तुम–
मत उड़ाओ!
मैं न रोऊं¸ तो शिला कैसे गलेगी!

इस सदन में मैं अकेला ही दिया हूं,
जब मिलेगी, रोशनी मुझसे मिलेगी।
                                                                 – रामावतार त्यागी

आज के लिए इतना ही

नमस्कार।