86. मैं चंद ख्वाब ज़माने में छोड़ आया था!

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आज की ब्लॉग पोस्ट में, वर्तमान की बात ये कि आज लंदन में ग्रीनविच पॉइंट गए, जहाँ के आधार पर ग्रीनविच मीन टाइम (जीएमटी) निश्चित किया जाता है, उसके बाद क्रूज़ में घूमे, बहुत से स्थान देखे, उनके बारे में बाद में बात करेंगे,एक बात जिसका उल्लेख अवश्य करना चाहूंगा, हम रात 9 बजे के बाद घूमकर वापस लौटे और तब तक सूरज की रोशनी काफी हद तक कायम थी।

फिलहाल लीजिए आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

आज मुकेश जी की गाई हुई दो प्रायवेट गज़लें शेयर कर रहा हूँ, ऐसी पहचान रही है मुकेश जी की, कि उन्होंने जो कुछ गाया उसको अमर कर दिया। उनके गायन में शास्त्रीयता का अभाव विद्वान लोग बताते हैं। मैं यह मानता हूँ कि मंदिरों में, पूजा में पहले गाया जाता था, उसके बाद गायन के आधार पर शास्त्रीयता के मानक तैयार किए गए। गायन की प्रभाविता के मूल में थी-आस्था। जो बात सीधे दिल से निकल रही है, वो दिल तक पहुंचेगी और अमर हो जाएगी, आपके शास्त्रीयता के मानक कुछ भी बताते रहें।

तो आज जो पहली गज़ल मुकेश जी की गाई हुई शेयर कर रहा हूँ, वह है-

जियेंगे मगर मुस्कुरा ना सकेंगे,
कि अब ज़िंदगी में मुहब्बत नहीं है।

लबों पे तराने अब आ न सकेंगे,
कि अब ज़िंदगी में मुहब्बत नहीं है।

बहारें चमन में जो आया करेंगी,
नज़ारों की महफिल सजाया करेंगी,
नज़ारे भी हमको हंसा ना सकेंगे,
कि अब ज़िंदगी में मुहब्बत नहीं है।

जवानी जो लाएगी सावन की रातें,
ज़माना करेगा मुहब्बत की बातें,
मगर हम ये सावन मना ना सकेंगे
कि अब ज़िंदगी में मुहब्बत नहीं है।

आप अगर सिर्फ इस गज़ल को पढ़ रहे हैं, तब भी जो शायर ने कहा है, वह आप तक पहुंच ही रहा है, लेकिन अगर आपने इसको मुकेश जी की आवाज़ में सुना है तो आपको इसका अतिरिक्त आयाम भी महसूस होगा, ऐसी आवाज़ जो गूंगे सुर को गूंज प्रदान करती है, विस्तार देती है। खासकर के उदासी के गानों में तो मुकेश जी कलेजा उंडेल देते हैं, हालांकि मस्ती के गानों में भी उनका कोई जवाब नहीं है।

लगे हाथ एक और प्रायवेट गज़ल मुकेश जी की गाई हुई शेयर कर रहा हूँ-

ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था,
दिल-ए-तबाह ने भी क्या मिज़ाज पाया था।

मुआफ कर न सकी मेरी ज़िंदगी मुझको,
वो एक लम्हा कि मैं तुझसे तंग आया था।

शगुफ्ता फूल सिमट के कली बने जैसे,
कुछ इस कमाल से तूने बदन चुराया था।

गुज़र गया है कोई लम्हा-ए-शरर की तरह,
अभी तो मैं उसे पहचान भी न पाया था।

पता नहीं कि मेरे बाद उनपे क्या गुज़री,
मैं चंद ख्वाब ज़माने में छोड़ आया था।

यहाँ शायरी तो शानदार है ही, लेकिन उसको जो प्रभाव मुकेश जी की गायकी देती है, वो लाजवाब है। जहाँ इस गज़ल में खुद्दारी को ज़ुबान मिली है,वहीं वह शेर भी बहुत अच्छा है कि जैसे कोई ऐसे मिला कि जैसे हमारी आंखों के सामने चमककर लुप्त हो जाए और यह भी कि हर कोई जब इस दुनिया से जाता है तब यह खयाल उसके मन में ज़रूर आता होगा कि काश मैंने यह काम और कर लिया होता, बहुत सारे सपने हमारे यहीं छूट जाते हैं।

खैर मेरा ज्ञान देने का कोई इरादा नहीं है, बस इन गज़लों का आनंद लें।
नमस्कार।