आज फिर से लंदन में घूमे और विशेष रूप से ‘लंदन आई’ और टॉवर ब्रिज को देखा। लेकिन फिलहाल लिखने की हिम्मत नहीं है, शायद कल इस बारे में लिखूंगा। आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

बचपन में चंदामामा पत्रिका में विक्रम और वैताल की कहानियां पढ़ा करता था, जिनकी शुरुआत इस प्रकार होती थी- ‘विक्रमादित्य ने जिद नहीं छोड़ी’ और फिर अपनी ज़िद के कारण जब वह वैताल को लादकर चलता है, तब वैताल उसे कहानी सुनाता है और बीच में टोकने पर वह फिर वापस उड़कर चला जाता है।

कुछ इस तरह ही मुझे याद है, और मुझे लगता है कि ब्लॉग लिखना एक बार शुरू किया तो फिर इसको बार-बार लिखने की ज़िद भी कुछ ऐसी ही है, यहाँ कहानी सुनाने वाले भी खुद और सुनने वाले भी खुद ही। हाँ ये देखकर अच्छा लगता है कि मेरी साइट पर जाकर बहुत सारे अजनबी लोग, पुराने ब्लॉग्स को खोज-खोजकर पढ़ते हैं।

हाँ तो मैंने अपने एनटीपीसी के सेवाकाल के संबंध में काफी लिखा है। वहाँ पर मुझे क्रय-समितियों में बहुत बार दौरों पर जाना पड़ा है। सच बात तो ये है कि मैं कभी खुद अपने लिए भी खरीदारी नहीं करता। क्रय समितियों में जो औपचारिकताएं हैं, चयन से संबंधित, वे सब वित्त और सामग्री विभाग के लोग पूरा करते थे, मैं मानव संसाधन विभाग का प्रतिनिधि होने के नाते, केवल मौन मध्यस्थ की भूमिका में उनके साथ रहता था। क्रय समिति में जाने का आकर्षण मेरे लिए मात्र दूसरे शहर में घूमना ही होता था।

हाँ कभी-कभी मेरी भूमिका आती थी, जैसा कि मैंने एक ब्लॉग में लिखा था, चरित्र की शिक्षा देने वाले एक विद्यालय के शिक्षक जब, स्कूल से संबंधित खरीदारी के लिए साथ गए थे, और कमीशन खाने के चक्कर में एक खास पार्टी की वकालत करने लगे थे, तब हमने वहाँ से न खरीदने का फैसला लिया और कोटेशन लेकर वापस आ गए थे।

आज अचानक शुरू-शुरू का एक क्रय-समिति में जाने का अनुभव याद आ गया।

विंध्यनगर, मध्य प्रदेश में मैं कार्यरत था, कार्यपालक के रूप में और वहाँ पास के ही बाज़ार से कुछ पुरस्कार आदि खरीदने थे। हमारी क्रय समिति में, अन्य लोगों के साथ ही साथ, मेरे अपने विभाग के एक पर्यवेक्षक थे, जो संभवतः काफी आदर करने वाले थे और मुझसे बात करते समय, उनके हर वाक्य में दो बार ‘सर’ आता था।

आज यह घटना अचानक क्यों याद आ गई, उसका कारण यही है कि वह दुकान, जहाँ से हमने सामान खरीदा वहाँ पर ही मैंने इस तरफ ध्यान दिया कि मेरा यह साथी जो हर वाक्य में दो बार ‘सर’ बोलता था, दुकान पर एक घंटा चर्चा करने के दौरान उसके मुंह से एक बार भी ‘सर’ नहीं निकला और इसके अलावा यदि ध्यान से दुकानदार से बातचीत के अंदाज को देखा जाए तो यही लगेगा कि वह साथी ही मेरे बॉस थे।

खैर अचानक मेरा यह ऑब्ज़र्वेशन मुझे आज याद आ गया, इस बदले अंदाज़ से यदि मेरे उस साथी को कोई लाभ हुआ तो वही जानता होगा, वैसे मैं बाद में सामान्यतः दूसरे विभागों के अपने समकक्ष या अपने से वरिष्ठ अधिकारियों के साथ ही गया और विक्रेता को अपनी स्थिति के बारे में ‘इम्प्रेस’ करने में मेरी कभी कोई रुचि नहीं रही, मुझे तो यही जल्दी रहती थी कि यह झमेला खत्म हो तो मैं कुछ समय शहर में घूम लूं।

खरीदारी की विशेषज्ञता तो मैं चाहता हूँ कि मेरी ऐसी ही बनी रहे-

हूँ बहुत नादान, करता हूँ ये नादानी
बेचकर खुशियां खरीदूं आंख का पानी,
हाथ खाली हैं मगर व्यापार करता हूँ।
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ॥

नमस्कार।