महान कवि, गीतकार पद्म भूषण गोपाल दास ‘नीरज’ जी नहीं रहे। हिंदी कविता, गीतों, गज़लों और फिल्मी गीतों के क्षेत्र में उन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। उनको विनम्र श्रद्धांजलि के साथ प्रस्तुत है आज की ब्लॉग पोस्ट।

पिछले सप्ताह कुछ काम के सिलसिले में बंगलौर जाना हुआ और मैं 3 दिन तक वहाँ रहा। बंगलौर जो आज देश के एक ’आईटी हब’ के रूप में प्रसिद्ध है और बहुत बड़ी संख्या में कंप्यूटर और आईटी के विशेषज्ञ वहाँ विकसित होते हैं, बड़ी-बड़ी आईटी कंपनियां वहाँ हैं, जिनसे होकर अंतर्राष्ट्रीय आईटी इंडस्ट्री का रास्ता खुलता है, इस क्षेत्र की प्रतिभाएं यहाँ काम करते-करते ब्रिटेन और अमरीका में प्रस्थापित हो जाती हैं अथवा उनका वहाँ आना-जाना तो लगा ही रहता है।

एक बात जो मैंने पिछली बार बंगलौर जाने पर महसूस की थी, वही इस बार भी उससे ज्यादा गंभीरता के साथ महसूस हुई। असल में तो मुझे अपना बचपन का शहर शाहदरा याद आ गया। शाहदरा, जो दिल्ली का हिस्सा है, लेकिन जिसे ‘यमुना पार’ कहा जाता है। यमुना पर उस समय एक ही पुराना पुल था, जिस पर ऊपर ट्रेन और नीचे सड़क का ट्रैफिक चलता था। वैसे यह ट्रैफिक आज भी वहाँ चलता है, लेकिन आज यमुना पर बहुत से पुल बन गए हैं, अक्सर यमुना के इस पार से उस पार जाते समय यह पता ही नहीं चलता कि कब यमुना निकल गई।

हाँ तो बंगलौर में ट्रैफिक को झेलेते हुए मुझे उस जमाने का शाहदरा, यमुना पार याद आ गया। यह याद आया कि यमुना का पुल जो एक किलोमीटर से कम लंबा है, सुबह-शाम के समय, उसको पार करने में उस समय सामान्यतः एक घंटा तो लग ही जाता था, और इसकी कोई अधिकतम सीमा आंकना संभव नहीं था। आज वो स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है, यह कम से कम 30-40 साल पुरानी बात हो गई है।

बंगलौर आकर यही खयाल आया कि आईटी का ये शहर, जो सूचनाओं और आंकडों को मिनटों में कहीं से कहीं पहुंचा देता है और यहाँ से होकर प्रतिभाएं भी कितनी तेजी से प्रगति का सफर तय कर लेती हैं, ये शहर कौन से युग में जी रहा है! क्या यहाँ पर सरकारों, नगर निकाय द्वारा समय की मांग के अनुसार, सड़कों और समानांतर परिवहन व्यवस्था के विकास पर बिल्कुल कोई ध्यान नहीं दिया गया है? मुझे तो लगता है कि यह आपराधिक लापरवाही है और यहाँ चली सरकारों की नीयत, उनकी कार्यशीलता पर बहुत बड़ा प्रश्न-चिह्न है।

किसी का एक शेर याद आ रहा है-

जिन्हें मंज़िलों की तलाश हो, मेरे क़ाफिले से अलग रहें,

कि मेरा तो मक़सद-ए-ज़िंदगी, फक़त उम्र भर के सफर में है।

हालांकि इस शेर में भी उम्र भर सफर करने की बात की गई है, परंतु बंगलौर में बिताए 3 दिनों में तो यही लगा कि वहाँ के लोगों को यदि तनावमुक्त रहना है तो उनको ध्यान की आदत डाल लेनी चाहिए, क्योंकि आप सड़क पर, एक ही स्थान पर कब तक कब तक खड़े रहेंगे, कब आगे खिसकेंगे, इसके बारे में कोई नहीं बता सकता। अब इसको आप सफर कहें तो कह लीजिए।

मैं समझता हूँ कि बंगलौर में ट्रैफिक सुगम बनाने के बारे में वहाँ के नगर प्रशासन और राज्य सरकार को गंभीर प्रयास करने की जरूरत है।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।