233. ये कहानी फिर सही!

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ज़िंदगी में अक्सर होता है कि जहाँ प्रेम होता है हम छोटी-छोटी बातों पर शिकायत करते हैं, तब तक, जब तक हमको लगता है कि हमारी शिकायत को कोई असर होगा, उसका कोई अच्छा नतीजा निकलेगा! लेकिन ऐसी स्थिति भी आती है कभी कि इंसान सोचता है कि शिकायत करने का क्या फायदा है।

कभी ऐसा खयाल आता है कि बाहर की घटनाओं पर तो दुनिया लिखती ही रहती है, भीतर- मन में घटने और घुटने वाली घटनाओं के बारे में लिखा जाना चाहिए। जैसे कवि रमेश रंजक जी ने लिखा था-

ये शिकन, टूटन, थकन संसार,
लिख नहीं पाता जिसे अखबार,
आज तक प्राचीन का प्राचीन!

खैर, जब हम मन के भीतर की घटनाओं के बारे में बात करते हैं तो हम देखते हैं कि कविता-शायरी में ज्यादातर यही तो होता है!

हाँ तो जहाँ से बात शुरू की थी, वहीं चलते हैं, जब इंसान को लगता है कि कुछ मन को जो चोट लगी है, जो कुछ अपने भीतर घटित हो चुका है, जो दुख मिले हैं किसी के कारण और हम उसका नाम भी नहीं ले सकते, इसी भावभूमि परपर एक गज़ल है, ज़नाब मसरूर अनवर जी की लिखी हुई, जिसे गुलाम अली जी ने गाया है और यह काफी प्रसिद्ध भी हुई है, आज वही शेयर करने का मन हो रहा है। गज़ल अपनी बात स्वयं बहुत सुंदर ढंग से कहती है। गज़ल से पहले गुलाम अली जी ने जोश मलीहाबादी जी के लिखे दो शेर अलग से भी पढ़े हैं, गज़ल के साथ वे दो शेर भी शेयर कर रहा हूँ-

दिल की चोटों ने कभी, चैन से रहने न दिया,
जब चली सर्द हवा, मैंने तुझे याद किया।

इसका रोना नहीं क्यों तूने किया दिल बर्बाद,
इसका गम है कि बहुत देर में बर्बाद किया।

और अब वो गज़ल-

हम को किस के ग़म ने मारा ये कहानी फिर सही
किसने तोड़ा दिल हमारा ये कहानी फिर सही ।

दिल के लुटने का सबब पूछो न सब के सामने
नाम आएगा तुम्हारा ये कहानी फिर सही।

नफ़रतों के तीर खा कर दोस्तों के शहर में
हमने किस किस को पुकारा ये कहानी फिर सही।

क्या बताएँ प्यार की बाज़ी वफ़ा की राह में
कौन जीता कौन हारा ये कहानी फिर सही।

अब जीत- हार को छोड़िए, आज के लिए इतना ही
नमस्कार।