हमारी प्राचीन परंपराओं में ऐसा माना जाता रहा है कि सुबह, शाम, रात हर समय का, हर घड़ी का अपना महत्व है, हम हर क्षण का, हर घड़ी का आनंद लेने में, हर अवसर को सेलीब्रेट करने में विश्वास रखते हैं। हमारे यहाँ सुबह के समय जैसे प्रभाती गाई जाती थी, हर घड़ी के अलग-अलग राग होते थे, जिनको समय के अनुसार गाया जाता था। हम ऐसा मानते रहे हैं कि हर क्षण को पूरे मन के साथ, आनंद से व्यतीत करना चाहिए।

इस बात का इसलिए ध्यान आया कि आज के जीवन में तो लगता है कि हर क्षण, हर घड़ी उदास होने के लिए, दुखी होने के लिए है। एक गीत याद आ रहा है, यद्यपि यह गीत एक प्रेमी की स्थिति को दर्शाता है, जो प्रेम में टूट चुका है।

ज्यादा भूमिका नहीं बांधूंगा, फिल्म- ‘मेरे हमदम, मेरे दोस्त’ के लिए यह गीत धर्मेंद्र जी पर फिल्माया गाया है, मजरूह सुल्तानपुरी जी के लिखे गीत को लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत निर्देशन में मोहम्मद रफी साहब ने बड़ी खूबसूरती के साथ गाया है।

कुल मिलाकर इतना है कि शाम हुई है और नायक अपने असफल प्यार को शराब के साथ सेलीब्रेट कर रहा है। खैर इस तरह दुख में अपने आप को शराब में डुबोना भी आज के जीवन की सच्चाई है और हमारा काम उपदेशक बनने का नहीं बल्कि आज के जीवन की इस सच्चाई को चित्रित करने वाले इस गीत का आनंद लेने का है। लीजिए प्रस्तुत है ये खूबसूरत गीत-

हुई शाम उनका ख़याल आ गया
वही ज़िंदगी का सवाल आ गया।

अभी तक तो होंठों पे था
तबस्सुम का एक सिलसिला
बहुत शादमाँ थे हम उनको भुलाकर
अचानक ये क्या हो गया,
कि चहरे पे रंग-ए-मलाल आ गया।
हुई शाम उनका ख़याल आ गया॥

हमें तो यही था ग़ुरूर
ग़म-ए-यार है हमसे दूर
वही ग़म जिसे हमने किस-किस जतन से
निकाला था इस दिल से दूर
वो चलकर क़यामत की चाल आ गया।
हुई शाम उनका ख़याल आ गया॥

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।